() अद्द्यागने……………………….पसा:|| (अथर्व वेद ४-४-६) अर्थ: हे अग्नि देव, हे सविता, हे सरस्वती देवी, तुम इस आदमी के लिंग को इस तरह तान दो जैसे धनुष की डोरी तनी रहती है
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जब रावण सीता का हरण करने के लिए अंगों के बारे में बोला है
और सीता को इन बातों से कोई संकोच नहीं हुआ🤷
यानी उस टाइम पर साधु ऐसी ही बातें औरतों से किया करते थे
वाल्मीकि रामायण अरण्य काण्ड सर्ग 46 श्लोक 15–25 तक
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पौराणिक सेक्स एजुकेशन
वेदों के अलावा पुराणों में भी हमे बहुत सारा सेक्स एजुकेशन देखने को मिलता है
जो कि इस तरह है,
जिस आदमी का लिंग दायीं तरफ झुका हुआ हो वह पुत्रवाला होता है , जिसका लिंग बायीं तरफ को झुका हुआ हो उसके कन्या पैदा होती हैं ॥१ ॥ मोटे रगोंवाले , टेढ़े लिंगों से दरिद्रता होती है । जिन पुरुषों के लिंग सीधे , गोल होवें , वे पुत्रों के भागी होते हैं
भविष्य पुराण
कड़वा तेल , भिलावा , बहेड़ा तथा अनार - इसकी चटनी से लेप करने से लिंग बढ़ता है
गरुड़ पुराण, अचार अध्याय 180
काफूर , देवदारु को शहद के साथ मिलाकर लिंग के लेप करें तो स्त्री वश में हो जाती है ॥२ ॥ हे महादेव ! नमक और कबूतर की बीठ शहद में मिलाकर यदि लिंग पर लेप करे तो स्त्री वश में हो जाती है ॥१६ ॥
गरुड़ पुराण, अचार, अध्याय 185
ब्रह्मचर्य में रहती हुई साध्वी स्त्री की योनि भी सुन्दर पुरुष को देखकर टपकने लग जाती है ॥२८ ॥
भविष्य पुराण, ब्रह्म अध्याय 73
स्नान किये हुए निर्मल सुगन्धित पुरुष को देखकर स्त्रियों की योनि ऐसे टपकने लगती है जैसे मशक में से पानी ॥३१ ॥
शिव पुराण,उमा.. अध्याय 24
पौराणिक पोल.....,.,,
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घोडा का वीर ऋग्वेद 1.164.35
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गोबर।
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स्त्री योनि का वर्णन sex पुस्तक
स्त्री योनि का वर्णन
बृहदारण्यकोपनिषद और छान्दोग्य उपनिषद में अलग उपमा देने वाली स्त्री योनि का अलंकारिकता का वर्णन किया गया है
योषा वा अग्नि ! तम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्
बृहदारण्यकोपनिषद और छान्दोग्य उपनिषद् में अलग अलग उपमा देकर स्त्री योनि का अलंकारिकता वर्णन किया गया है
योषा वा अग्नि ! तम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेंऽगारा अभिनंदा विस्फुलिंगा:
अर्थात: गौतम ! स्त्री अग्नि है . उस का गुप्तांग ईंधन है . गुप्तांग पर उगे बाल धुआं है . योनि ज्वाला है . लिंग प्रवेश अंगारे हैं और कामानंद ही चिनगारियां हैं .
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(बृहदारण्यकोपनिषद 6-2-13)
यही बात छान्दोग्य उपनिषद् में मिलती है
योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समिध् यदुपमत्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदंतः करोति ते अंगाराः अभिनंदा विस्फुलिंगाः .
अर्थात: हे गौतम , स्त्री जाति अग्नि है . उस का गुप्तांग ही ईंधन है . कामक्रीड़ा के लिए बोलना ही धुआं है . उस की योनि ही ज्वाला है . उस में पुरुष की जननेंद्रिय और आनंद की प्राप्ति ही चिनगारियां हैं .
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