वैदिक ईश्वर शरीरधारी
* हे बृहस्पति और इंद्र आनंद देने वाले बलवान विरो को निवास कराने वाले तुम दोनों सोमरस को इस यज्ञ में पीओ । ( अर्थववेद 20 : 13 : 1 )
* आगे बढ़ो और आकाश में आओ जाओ तुम्हारे लिए स्थान बनाया गया है (अर्थववेद 20 : 13 : 2 )
* ☝️ उड़ने वाले घोड़े से आकाश में आते जाते थे 🤔 कभी घोड़ा कभी हाथी क्या तमाशा लगा रखा है वैदिक ईश्वर ने ?
* इन्द्र के दो हाथ है जो अवसर आने पर उसका उपयोग करता है । (अर्थववेद 19 : 13 : 1 )
* हे इन्द्र धन के लिए जोड़े गये सुंदर केशो ( बाल )
वाले रथ चलने वाले दो घोड़े तुझको सब ओर ले चले
(अर्थववेद 20 : 38 : 2 ) (अर्थववेद 20 : 47 : 28 )
* व्रजधारी ( हाथों में हथियार वाला ) तेजोमय इन्द्र ही हवा नित्य मिले हुए दोनों संयोग वियोग गुणों का मिलाने वाला है और वचन का योग्य बनाने वाला है ।
(अर्थववेद 20 : 38 : 5 )
* क्या पोपलीला है वैदिक ईश्वर कभी घोड़े पर सवारी कभी
कभी व्रजधारी क्या मिथ्या है निराकार की 🙄
* और कई सौ उदहारण है शरीर धारी होने के परंतु अक्ल मंदो के लिए इतना काफी है वैदिक ईश्वर ( इन्द्र ) नशेड़ी होने के साथ साथ बलात्कारी भी था 👇👇👇👇
* तो ये थे वैदिक ईश्वर के शरीर धारी और नशेडी होने के कुछ प्रमाण क्या बात है ये तो चंद ही है नही तो वेद अश्लीलता और ऐसी बातों से भरा पड़ा है । चलो एक क्षण के लिए मान लिया कि सोमरस का मतलब ओषधि है , पर ये तो सिद्ध हुआ कि वैदिक ईश्वर शरीरधारी है और वेदों का बनावटी ईश्वर निराकार नही बल्कि दो पैरो पर चलने कोई मूर्ख मनुष्य है जिसने अपने स्वार्थ के लिए वेदों की रचना की थी , नियोग के नाम पर अपनी हवस पूरी करना अपने आपको श्रष्ट बनाने के लिए शुद्र आदि के नाम देना और बहुत कुछ केवल अपने मतलब के लिए 😢
●●●●
No comments:
Post a Comment