दशरथ की 3 रानियां तो सब जानते है लेकिन बाल्मिकी रामायण में 2 जगहों पर दशरथ की 350 रानियां लिखी हुई हैं। ऐसा लगता है कि दशरथ की 350 +3 यानी 353 रानियां थी।
अयोध्या कांड सर्ग 34
श्लोक 10 से 13 :- जब राम बनवास जाने के तैयारी कर रहा है तब दशरथ सुमंत्र को कहता है कि इस घर में मेरी जितनी स्त्रियां है उन सबको बुला लो मैं उन सब के साथ श्री राम जी को देखना चाहता हूं। ( श्लोक 10) 350 स्त्रियां जिनकी आंखे श्री राम जी के वियोग में रो रो कर लाल हो गई थी, कौशल्या को घेर कर दशरथ के पास आ गई।( श्लोक 13)
अयोध्या कांड सर्ग 39,
श्लोक 36, 37 :- जब राम बनवास के लिए विदा होने लगता है तब इस श्लोक में इस तरह लिखा है " मातासे इस प्रकार अपना निश्चित अभिप्राय बताकर दशरथनन्दन श्रीरामने अपनी अन्य साढ़े तीन सौ माताओंकी और दृष्टिपात किया और उनको भी कौसल्या की ही भांति शोकाकुल पाया। तब उन्होंने हाथ जोड़कर उन सबसे यह धर्मयुक्त बात कही ।
इस के अलावा भी कई जगहों बेशक 350 गिनती तो नही लिखी लेकिन रानियां
3 से ज्यादा थी, यह स्पष्ट हो जाता है।
बाल कांड सर्ग 77
जब सीता शादी के बाद पहली बार अयोध्या महल में आई उस का वर्णन श्लोक में इस प्रकार किया है, " राजभवन पहुंचने पर महलवासी नाते रिश्तेदारों ने महाराज का चंदन आदि फूल माला से भली भांति सरकार किया। उधर कौशल्या, सुमित्रा कैकई और दूसरी रानियों ( राजपत्नियां) बहुओं का पनिछा करने में लगी। रानियां चारों बहुओं को महलों में लिवा ले गई. ( श्लोक 10, 11, 12)
अयोध्या कांड सर्ग 20
श्री राम को हाथ जोड़े विदा मांगते हुए महाराज के अन्त पुर से बाहर आते देख रनवास की स्त्रियों में हा हा कार मच गया।( श्लोक 1)
वो रो रो कर कहने लगी राम जी पिता की प्रेरणा पाए बिना ही दास दासियों समेत सभी अन्त पुर वासियों की अभिलाषा पूरी कर दिया करता था वे ही आज वन को जा रहें हैं। श्री राम जी अपनी माता कौशल्या की तरह ही हम सब को मानते चले आएं हैं। (2, 3)
इस प्रकार अन्त पुर वासिनी दशरथ की रानियां वत्सरहित गो की तरह पति की निंदा करती हुई उच्च स्वर में रोने लगी. दशरथ जो पहले ही पुत्रशोक में संतप्त हो रहे थे, रानियों के अंतर्नाद को सुन लज्जा और दुख के मारे पलंग पर गिर पढ़े। (श्लोक 6, 7)
अयोध्या कांड सर्ग 40
राम जब बनवास को चल पड़े तब का वर्णन इन शब्दों में, " महाराज को और उनके रनवास की समस्त रानियों, नोकर चाकरों को दुखी देख कोई कहता हा राम, कोई कहता हा कौशल्या। यानी सभी रो रहे थे। ( श्लोक 38)





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