Tuesday, 9 August 2022

पुत्र प्राप्ति।

इन 7 पुत्रों के पिता हैं शिव, कार्तिकेय और गणपति के अलावा ये भी हैं 
  

अमतौर पर लोगों को भगवान शिव के दो पुत्रों गणेश और कार्तिकेय के बारे में पता है। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भगवान शिव के इन दोनों के अलावा 5 और पुत्र थे। पौराणिक कथाओं में इनके 7 पुत्रों के बारे में बताया गया है। भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन के बाद शिवजी का गृहस्थ जीवन शुरू हुआ और उनके जीवन में अनेक प्रकार की घटनाओं से शिव के 7 पुत्र हुए। आइए जानते हैं भगवान शिव के 7 पुत्रों के बारे में…

1/7 कार्तिकेय

कथाओं के अनुसार, सती की मृत्यु के बाद भगवान शिव कठोर तपस्या पर बैठ गए थे तब तारकसुर नामक राक्षस का अत्याचार बढ़ गया था। तारकसुर से परेशान सभी देवता ब्रह्माजी के पास गए तब उन्होंने बताया कि भगवान शिव और पार्वती का पुत्र तारक का अंत करेगा। इसके बाद पार्वती का विवाह हुआ और इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म होता है और राक्षस का अंत।

2/7 गणेश

कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं, उन्होंने देखा कि पहरे पर कोई नहीं है। तब उन्होंने अपने शरीर के मैल और उबटन से एक अपने पुत्र का निर्माण किया और पहरे पर खड़ा कर दिया। कुछ देर बाद भगवान शिव आए और बालक ने उन्हें जाने से रोक दिया। क्रोधवश भगवान शिव ने बालक का गला काट दिया। फिर इसके बाद हाथी के बच्चे का सिर गणेशजी को लगाया।

3/7 सुकेश

शिव का तीसरा पुत्र सुकेश था। पुराणों के अनुसार, राक्षसराज हेति ने भया नामक कन्या से विवाह किया। इन दोनों से विद्युत्केश नामक एक पुत्र का जन्म हुआ। विद्युत्केश का विवाह संध्या की पुत्री सालकटंकटा से हुआ। सालकटंकटा व्यभिचारिणी थी। इस वजह से जब उसका पुत्र जन्मा तो उसे लावारिस छोड़ दिया। भगवान शिव और माता पार्वती ने उस बच्चे को सुरक्षा दी और उसे अपना पुत्र बना लिया।

4/7 अयप्पा

भगवान शिव के चौथे पुत्र हैं अयप्पा। दक्षिण भारत में सबरीमाला मंदिर में इनकी पूजा होती है। अयप्पा भगवान शिव और भगवान विष्णु के रूप मोहनी के पुत्र हैं। विष्णु का मोहिनी रूप देखकर शिवजी का वीर्यपात हो गया और उससे अयप्पा का जन्म हुआ।

5/7 जलंधर

श्रीमद्देवी भागवत् पुराण के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने अपने तीसरी आंख से उत्पन्न हुआ तेज समुद्र में फेंक दिया इससे जलंधर का जन्म हुआ। जलंधर भगवान शिव से बहुत नफरत करता था। एक बार माता पार्वती को पत्नी बनाने के लिए भगवान शिव से जलंधर ने युद्ध आरंभ कर दिया और मारा गया।

6/7 भौम

शिवजी का छठवें पुत्र का नाम भौमा है। कठोर तपस्या में लीन भगवान शिव का पसीना भूमि पर गिर गया। इसी पसीने से देवी भूमि को एक पुत्र हुआ। इस पुत्र की चार भुजाएं थीं और वह रक्त वर्ण का था। इस पुत्र का पृथ्वी ने पालन पोषण करना शुरु किया। तभी से भूमि का पुत्र होने के कारण यह भौम कहलाया। मंगल ग्रह को ही भौम के नाम से भी जाना जाता है।

7/7 अंधक

एक बार माता पार्वती ने पीछे से आकर भगवान शिव की आंखे बंद कर दीं। इससे संसार में अंधकार छा गया, तब भगवान ने तीसरी आंख खोल दी। तीसरे आंख की रोशनी की वजह से माता पार्वती को पसीना आ गया और उसकी बूंद से पुत्र का जन्म हुआ। अंधकार में जन्म लेने की वजह से उसका नाम अंधक रखा गया। यह जन्म से ही नेत्रहीन था।

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भृगु पुत्र उशना उर्फ शुक्राचार्य का  नाम शुक्राचार्य इस लिए हुआ कि उशना को शिव ने अपने मुंह से अंदर डाल कर अपने लिंग के रास्ते  से बाहर निकाला था। शुक्र का अर्थ वीर्य होता है।

भृगु पुत्र उशना ने अपने योग बल से  खजाने के अध्यक्ष कुबेर के अंदर प्रवेश करके सारे खजाने पर अधिकार कर लिया। कुबेर ने शिव को शिकायत की। शिव ने क्रोध से उशना को पकड़ कर मुंह के रास्ते पेट में डाल लिया।

फिर  शिवजी लाखों अरबों ( लाखों करोड़ों नहीं) वर्ष तक पानी के अंदर तपस्या करते रहे। फिर उन्होंने देखा कि मेरी ही तपस्या के प्रभाव से शुक्राचार्य को भी तेज प्राप्त हुआ है।

उशना बाहर आना चाहता था। शिव ने बोला कि मेरे लिंग ( शिशन) के रास्ते से बाहर निकलो। तब वह शिष्न के रास्ते जैसे वीर्य बाहर आता है ऐसे बाहर आए। इसी वजह से उनका नाम शुक्राचार्य ( शुक्र का अर्थ वीर्य) हुआ। पार्वती ने उसको अपना बेटा माना।

यह कहानी है  महाभारत  के शान्तिपर्व के 289 वे अध्याय में दर्ज। गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा  प्रकाशित महाभारत का संबंधित अध्याय के पन्ने नीचे पोस्ट कर दिए है।

इतने प्रभावशाली लिंग की पूजा करना तो बनता ही है।


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भृगु पुत्र उशना उर्फ शुक्राचार्य का  नाम शुक्राचार्य इस लिए हुआ कि उशना को शिव ने अपने मुंह से अंदर डाल कर अपने लिंग के रास्ते  से बाहर निकाला था। शुक्र का अर्थ वीर्य होता है।

भृगु पुत्र उशना ने अपने योग बल से  खजाने के अध्यक्ष कुबेर के अंदर प्रवेश करके सारे खजाने पर अधिकार कर लिया। कुबेर ने शिव को शिकायत की। शिव ने क्रोध से उशना को पकड़ कर मुंह के रास्ते पेट में डाल लिया।

फिर  शिवजी लाखों अरबों ( लाखों करोड़ों नहीं) वर्ष तक पानी के अंदर तपस्या करते रहे। फिर उन्होंने देखा कि मेरी ही तपस्या के प्रभाव से शुक्राचार्य को भी तेज प्राप्त हुआ है।

उशना बाहर आना चाहता था। शिव ने बोला कि मेरे लिंग ( शिशन) के रास्ते से बाहर निकलो। तब वह शिष्न के रास्ते जैसे वीर्य बाहर आता है ऐसे बाहर आए। इसी वजह से उनका नाम शुक्राचार्य ( शुक्र का अर्थ वीर्य) हुआ। पार्वती ने उसको अपना बेटा माना।

यह कहानी है  महाभारत  के शान्तिपर्व के 289 वे अध्याय में दर्ज। गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा  प्रकाशित महाभारत का संबंधित अध्याय के पन्ने नीचे पोस्ट कर दिए है।

इतने प्रभावशाली लिंग की पूजा करना तो बनता ही है।

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