प्रस्तुत है
वेद का जियान विजयान अर्थ का अनर्थ
अवर्त्या। शुनः। आन्त्राणि। पेचे। न। देवेषु। विविदे। मर्डितारम्। अपश्यम्। जायाम्। अमहीयमानाम्। अध। मे। श्येनः। मधु। आ। जभार ॥१३॥
ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 18; मन्त्र » 13
#ऋग्वेद भाष्य (स्वामी दयानन्द सरस्वती के संस्कृत भाष्य के आधार पर) - हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती
विषय - फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ -
हे राजन् ! जो (मे) मेरी (अमहीयमानाम्) नहीं सत्कार की गई (जायाम्) स्त्री को (श्येनः) वाज पक्षी के सदृश शीघ्र चलनेवाला सब ओर से (आ, जभार) हरता है (अधा) इसके अनन्तर (शुनः) कुत्ते की (अवर्त्या) नहीं वर्त्तने योग्य (आन्त्राणि) और उठे हैं हाड़ जिनसे उन स्थूल नाड़ियों के सदृश शरीर को (पेचे) पचाता है, इससे (मर्डितारम्) सुख करनेवाले आपका मैं (अपश्यम्) दर्शन करूँ। वह जैसे (देवेषु) विद्वानों में (मधु) मधुर विज्ञान को (न) नहीं (विविदे) प्राप्त होता है, वैसे उसको निरन्तर दण्ड दीजिये ॥१३॥
★ पदार्थ में दयानंद चाचा ने से राजन् ! का अर्थ #मंत्र में किस शब्द से किया है?
★ नाड़ियां को पचाने वाला का दर्शन क्यों करना है ?
★ कर्म के अनुसार सबको दंड मिलता है तो इस मंत्र के अनुसार दंड देने का आज्ञा दिया जा रहा है ??
नोट- दो भाष्य कारों का भाष्य पेश किया है
★ दोनों भाष्यकारों के भाष्य में कितना अंतर है ?
★ दोनों लोगों का भाष्य एक दुसरे के #विरोधाभास क्यों ?
★ #कुत्ते का #मांस #खाने का तात्पर्य क्या है?
★ हम अपने #पत्नी को #अपमानित होते #देखते रहे
आखिर #क्यों ????
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वेद का जियान विजयान प्रस्तुत 👇
यत्र । समुद्रः । स्कभितः । वि । औनत् । अपाम् । नपात् । सविता । तस्य । वेद । अतः । भूः । अतः । आः । उत्थितम् । रजः । अतः । द्यावापृथिवी इति । अप्रथेताम् ॥
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 149; मन्त्र » 2
ऋग्वेद भाष्य (ब्रह्ममुनि जी) - हिन्दी - स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक
पदार्थ -
(यत्र) जिसमें जिसके आश्रय में (समुद्रः) समुन्दनशील आकाशस्थ सूक्ष्म जलाशय (स्कभितः) वायु के द्वारा सम्भाला हुआ-ठहरा हुआ (वि-औनत्) भूमि को विशेषरूप से गीला करता है (अपां नपात्) जलों को न गिरानेवाला (सविता तस्य वेद) परमात्मा उसको जानता है (अतः-भूः) इससे जो उत्पन्न होती है विकृति महत्तत्त्वादि पञ्चतन्मात्र पर्यन्त सत्ता (अतः-रजः उत्थितम्-आः) यहीं से अन्तरिक्षलोक उत्पन्न हुआ है (अतः) यहीं से (द्यावापृथिवी) द्युलोक और पृथिवीलोक (अप्रथेताम्) प्रथित हुए #फैले ॥२॥
भावार्थ - परमात्मा के आश्रय आकाश का जलाशय वायु के द्वारा सम्भला हुआ है, वही भूमि पर बरसता है, वह कैसे बनता और कैसे स्थिर रहता है, उसको वायु नहीं जानता, किन्तु परमात्मा जानता है, उस परमात्मा से महत्तत्त्व से लेकर पञ्च तन्मात्राओं तक सूक्ष्म सृष्टि उत्पन्न होती है, वहीं से अन्तरिक्षलोक भी उत्पन्न होता है, और द्युलोक पृथ्वीलोक भी उसी के द्वारा #फैलाये हुए हैं ॥२॥
समीक्षा - फैला वह होता है जो चपटा होता है
गेंद को कोई फैला या चपटा नहीं कह सकता क्योंकि गेंद गोल होता है
लेकिन आप चादर को फैला या चपटी कहते हैं
क्योंकि चादर गोल नहीं हो सकता है बल्कि फैला होता है अर्थात चपटी।
यह वेद मंत्र स्पष्ट करता है
कि पृथ्वी चपटी है
जबकि विज्ञान के अनुसार
पृथ्वी गोल है।
इसके यह स्पष्ट होता है
वेद गपोड़ गाथा है
जिसमें वैदिक ईश्वर को यह नहीं पता
पृथ्वी गोल है या चपटी?
★ वैदिक ईश्वर ने पृथ्वी को चपटी बनाया है तो विज्ञान के अनुसार पृथ्वी गोल क्यों है???
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