Thursday, 11 August 2022

भागवत।


🔼पाखंड शिरोमणि श्रीमद्धभागवत महापुराण🔽

श्रीमद्भागवत पुराण समस्त पुराणों का मुकुटमणि है। ऐसा माना जाता रहा है, भागवत में कहा गया है-

सर्ववेदान्तसारं हि श्रीभागवतमिष्यते।
तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रतिः क्वचित् ॥
श्रीमद्भाग्वतम् सर्व वेदान्त का सार है। उस रसामृत के पान से जो तृप्त हो गया है, उसे किसी अन्य जगह पर कोई रति नहीं हो सकती। (अर्थात उसे किसी अन्य वस्तु में आनन्द नहीं आ सकता) क्यों कि इस में है ही कुछ ऐसा।

अष्टादश पुराणों में भागवत नितांत महत्वपूर्ण तथा प्रख्यात पुराण है। पुराणों की गणना में भागवत अष्टम पुराण के रूप में परिगृहीत किया जाता है (भागवत 12.7.23)

इस पुराण में बारह स्कन्ध हैं, जिनमें विष्णु के अवतारों का ही वर्णन है। नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना पर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूत जी ने इस पुराण के माध्यम से श्रीकृष्ण के चौबीस अवतारों की कथा कही है।

इस पुराण में वर्णाश्रम-धर्म-व्यवस्था को पूरी मान्यता दी गई है तथा स्त्री, शूद्र और पतित व्यक्ति जो वेद सुनने के अधिकारी नहीं है वह वंचित भागवत सुन कर अपना  उद्धार करें।

श्रीमद्भागवत पुराण’ में बार-बार श्रीकृष्ण के ईश्वरीय और अलौकिक रूप का ही वर्णन किया गया है। पुराणों के लक्षणों में प्राय: पाँच विषयों का उल्लेख किया गया है, किन्तु इसमें दस विषयों-सर्ग-विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय का वर्णन प्राप्त होता है । इसमें श्रीकृष्ण के गुणों का बखान करते हुए कहा गया है कि उनके भक्तों की शरण लेने से किरात् हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन और खस आदि तत्कालीन जातियाँ भी पवित्र हो जाती हैं।

लेकिन यदि कोई इस पुराण को निष्पक्ष भाव से पढे तो लगेगा कि यह किसी महाधूर्त महामूर्ख लम्पट प्रमादी खल कामी द्वारा लिखा गया है ।
हम ही नहीं बल्कि अत्रि स्मृतिकार ने तो इसके संबंध में यहाँ तक लिख दिया है 👇

वैदर्विहिनाश्च पठन्ति शास्त्रं । शास्त्रेण हीनाश्च पुराण पाठाः।। 
पुराणहीनाः कृषिणो भवन्ति। भ्रष्टस्ततो भागवत भवन्ति।।                           (अत्रिस्मृति/381)

अर्थात वेदों से जो भ्रष्ट है वे उनसे नीचे के ग्रंथ शास्त्रो को पढतें है। जो शास्त्रों से हीन हैं वे उनसे भी निम्न कोटि के ग्रंथ पुराणों को पढतें है, जो पुराणों से भी हीन है वे  खेती का कार्य करते हैं ।तथा जो लोग इन सबसे भ्रष्ट वे लोग सबसे नीच ग्रंथ भागवत को पढतें फिरते है।

सही ही तो कहा है स्मृतिकार ने इसमें दो राय नहीं कि भागवत जैसा फूहड़ बकबास बेतुकी बेमतलबी अनुपयोगी बातों से भरा ग्रंथ कोई नहीं , हम कह सकते हैं कि यह समस्त फूहड़ ग्रंथो का मुकुट शिरोमणि ग्रंथ है। हम यह बात हवा में नहीं लिख रहे हैं बल्कि तथ्यों के आधार पर ही यह लिखने की हिम्मत कर पाए है आप परेशान न हो हम इसका प्रमाण भी देगें कि यह धूर्त मक्कार पाखंडियों द्वारा ही लिखा गया है अब देखिये -:

◾यज्ञ में पशु बलि -:
निवारयामासुरहो महामते न युज्यतेऽत्रान्यवधः प्रचोदितात्।।                                (04/19/27)
                
यज्ञदीक्षा ले लेने पर शास्त्रविहित यज्ञ पशु को छोड कर और किसी का वध करना उचित नहीं।। 

◾मत्स्य भगवान के शरीर का विस्तार चार लाख (400000) कोस था ।                  (09/24/44)🙃
📝 -- एक कोस में तीन किलोमीटर (400000 का गुणा 3 से करने पर 1200000 वर्ग किलोमीटर 
मतलब भारत के  3,287,000 km² से आधे से कुछ कम।

◾ब्रह्मा को अपनी पुत्री सरस्वती पर मोहित होने पर उन्हीं ब्रह्मा के पुत्रो द्वारा खरी खोटी सुनाना -:

नैतत्पूवैंः कृतंत्त्वद्य न करिष्यन्ति चापरे।
 यत्त्वं दुहितरं गच्छेरनिगृह्यागड्गजं प्रभु।। 
                                    (30/12/03) पृष्ठ - 252
मरीचि आदि बोले - पिताजी!  आप समर्थ है फिर भी अपने मन में उत्पन्न हुये कामवेग को न रोक कर पुत्री गमन जैसा दुस्तर पाप करने का संकल्प कर रहे हैं। ऐसा तो आपसे पूर्ववर्ती किसी ब्रह्मा ने नहीं किया और न आगे ही कोई करेगा। 🤧

◾ भगवान शिव शंकर की अरबो खरबो सेविकाए -:
भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्त्रैरवरूध्यमानो। 
भव उपधावति ।🤑
                                   (19/17/05) पृष्ठ - 614

◾छीक से मनुष्य पैदा होना -:
क्षुवतस्तु मनोर्जज्ञे इक्ष्वाकुर्घ्राणतः सुतः  😌
                               (04/06/09) खंड -2 , पृष्ठ -24
◾श्राद्ध में पवित्र पशुओं का मांस प्रयोग। 
                                                       (06/06/09)
◾वरूण के लिए हरिश्चन्द्र का नरमेध यज्ञ के लिए अपने पुत्र रोहित को यज्ञ पशु बनाने का वरूण देव को वचन।                                    (10-11-12/07/09)

◾कुब्जा और श्री कृष्ण की मनोहर सेज पर संभोग क्रीडा। पढे श्रीमद्धभागवत महापुराण स्कंद -10 अध्याय  - 48 श्लोक - 01 से लेकर 11 तक😘😍

◾यदुवंश के बालको को पढाने के लिए तीस करोड़ अठ्ठासी लाख आचार्य (308800000)😱😯

◾श्री कृष्ण के नाना उग्रसेन के एक नील (10000000000000) सैनिक । (42/90/10)😶

◾श्री कृष्ण द्वारा अन्य यदुवंश शिरोमणियों के साथ यज्ञ के लिए मेध्य पवित्र पशुओं को मार कर लाना -:
👇

चरन्तं मृगयां कापि हयमारूह्य सैन्धवम्। 
घ्रन्तं ततः पशून् मेध्यान् परीतं यदुपुड्गवै।। 
                                   (35/69/10) ! पृष्ठ - 577
नारद ने देखा कि - श्री कृष्ण श्रेष्ठ यादवों से घिरे हुये सिन्धूदेशीय घोड़े पर चढ़कर मृगया कर रहे हैं और उसमे यज्ञ के लिए मेध्य पशुओं का ही वध कर रहे हैं। 
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आप ने पढा , समझा इसके लिए में आभारी हूं !
अब हम यह देखते हैं कि क्या यह भागवत पुराण वेदव्यास ने लिखा और क्या राजा परीक्षित ने शुकदेव से सुना था!?

तो अब इसके लिए हमें महाभारत सहिंता को पलटना पड़ेगा 
 महाभारत  में आदिपर्व  के अन्तर्गत आने वाले आस्तीकपर्व  (अध्याय - 40 से 43) में राजा परीक्षित उपाख्यान है जिसमें उनकी कथा कुछ इस प्रकार दी है 
👇
एक बार राजा परीक्षित आखेट हेतु वन में गये। वन्य पशुओं के पीछे दौड़ने के कारण वे प्यास से व्याकुल हो गये तथा जलाशय की खोज में इधर उधर घूमते घूमते वे शमीक ऋषि के आश्रम में पहुँच गये। वहाँ पर शमीक शान्तभाव मौन व्रत धारण किये हुये  एकासन पर बैठे हुये थे। राजा परीक्षित ने उनसे जल माँगा किन्तु शमीक ऋषि ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया, राजा परीक्षित को प्रतीत हुआ कि यह ऋषि ध्यानस्थ होने का ढोंग कर के मेरा अपमान कर रहा है। उन्हें ऋषि पर बहुत क्रोध आया। उन्होंने अपने अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से पास ही पड़े हुये एक मृत सर्प को अपने धनुष की नोंक से उठा कर ऋषि के गले में डाल दिया और अपने नगर वापस आ गये।

डारि नाग ऋषि कंठ में, नृप ने कीन्हों पाप।
      होनहार हो कर हुतो, ऋंगी दीन्हों शाप॥

शमीक ऋषि तो मौन रहे, किन्तु उनके पुत्र ऋंगी ऋषि को जब इस बात का पता चला तो उन्हें राजा परीक्षित पर बहुत क्रोध आया। उस ऋषिकुमार ने कमण्डल से अपनी अंजुली में जल ले कर तथा उसे मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके राजा परीक्षित को यह श्राप दे दिया कि जा तुझे आज से सातवें दिन तक्षक सर्प डसेगा। जब परीक्षित को पता चला कि मुझे शाप दिया गया है तब तो उससे अपनी सुरक्षा बढा दी और एक खंभे का मकान बनवाकर  उस पर ही सैनिकों और वैद्य आदि के साथ रहने लगा और वही से राज्य का कार्य भार सम्भालते रहे, तब तक्षक ने अपने साथी नागों को ब्रह्मण का भेष बना फल ले कर राजा के यहाँ पहुँचाया और स्वयं उन फलों में एक छोटा सा कीट बन कर छिप गया ,जब वह राजा ने फल खाने के लिए उठाए तब तक्षक ने भयानक विशाल सर्प का रूप धारण कर लिया बन कर राजा को लपेड लिया और उसे डस लिया जिससे राजा की मृत्यु हो गई ।

📝 - इस पूरे प्रकरण में कही नहीं आया कि शुकदेव ने परीक्षित को भागवत कथा सुनाई, बल्कि राजा परीक्षित तो डर कर सात दिन  उंचे एक  खंभे पर अट्टालिका बना वही कठोर सुरक्षा में रहे वह गंगा तीर पर गये ही नहीं जैसा भागवत में लिखा है कि वो सात दिन तक गंगा के तीर में अनेक ऋषियों साथ सात दिन तक शुकदेव से भागवत सुनते रहे ।

 सबसे बड़ा सफेद झूठ तो यही है कि शुकदेव जी परीक्षित के समय थे। शुकदेव जी की मृत्यु तो महाराज युधिष्ठिर के शासनकाल से भी बहुत पहले हो गई थी यहाँ तक कि शुकदेव की मृत्यु के संबंध में शांतनु पुत्र भीष्म को भी नहीं पता था उन्होने भी किसी अन्य से उनके बारे में जानकारी प्राप्त की थी,  देखिए प्रमाण महाभारत (शांतिपर्व में मोक्षधर्म उपपर्व के अध्याय = 323-333 तक भीष्म युधिष्ठिर संवाद ,गीताप्रेश महाभारत पृष्ठ - 5327)

अब आप समझ गये होंगे कि जिस शुकदेव की मृत्यु के संबंध में भीष्म युधिष्ठिर के पूछने पर  उनको बता रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि शुकदेव युधिष्ठिर से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हुये अब बताओं कि जो शुकदेव युधिष्ठिर से पहले ही मर गये वो भला, अर्जुन के पोते परीक्षित को भागवत कथा कहां से सुनाने आयेंगे ,मतलब साफ है कि  यह भागवत भक्तिकालीन ग्रंथ है जो दक्षिण भारतीय चंडूखोर बैष्णवों ने बना कर तैयार किया था, जो समय समय पर लिखा जाता रहा और फिर बाद में शुकदेव और महर्षि व्यास के नाम से प्रसारित कर दिया गया।

..... #भागवत कथा #समाप्त ।

आइये अब आरती गाये भागवत कथा की

भागवत पाखंड की है आरती
धर्मियों को पाप में है डारती 

ये मूर्ख ग्रन्थ ये मुख्य पन्थ
ये पंचम अवेद निराला
नव ज्योति बुझानेवाला

काम गान यही वरदान यही
जग की अमंगल आरती
धर्मियों को पाप में है डारती   ...

ये अशान्तिगीत अपावन पुनीत सा
कोप बढानेवाला
हरि दरस न दिखानेवाला
है दुःख करनी, है सुःख हरिनी
कुब्जागामी की आरती
धर्मियों को पाप में है डारती   ...

ये धूर्त बोल, जग फन्द मोल
सन्मार्ग भटकानेवाला
बनी को मिटानेवाला
काम यही, प्रमाद यही
खल काम महिमा की आरती
धर्मियों को पाप में है डारती  ...

#बोलिये #कुब्जागामी #भगवान #रणछोड़ की #जय 

📝 -- यदि लेख में कुछ दोष रह गया हो तो कृपया हमें अगवत कराए , हम उस में  सुधार करने की कोशिश करेगें धन्यवाद 

#लेख #प्रगति #पर #है......................

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