Thursday, 11 August 2022

सत्यार्थ प्रकाश।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के ‘#शंका-#समाधान #परिशिष्ट में पंडित  ज्वालाप्रसाद ‘शर्मा द्वारा नियोग प्रथा के समर्थन में अनेक प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। 

लिखा है कि प्राचीन वैदिक काल में कुलनाश के भय से ऋषि-मुनि, विद्वान, महापुरुषों से नियोग द्वारा वीर्य ग्रहण कर उच्च कुल की स्त्रियां संतान उत्पन्न करती थी। 

जो प्रमाण पंडित जी ने प्रस्तुत किए हैं वे सभी महाभारत काल के हैं। 

क्या #महाभारत काल ही प्राचीन वैदिक काल था ? क्या नियोग ही ऋषियों का एक मात्र प्रयोजन था?।

यहाँ यह तथ्य भी विचारणीय है कि अगर स्वामी दयानंद सरस्वती नियोग को एक वेद प्रतिपादित और स्थापित व्यवस्था मानते थे तो उन्होंने इस परंपरा का खुद पालन करके अपने अनुयायियों के लिए आदर्श प्रस्तुत क्यों नहीं किया ? इससे स्वामी जी के चरित्र को भी बल मिलता और एक मृत प्रायः हो चुकी वैदिक परंपरा पुनः जीवित हो जाती। 

यह भी एक अजीब विडंबना है कि जिस वैदिक मंत्र से स्वामी जी ने नियोग परंपरा को प्रतिपादित किया है उसी मंत्र से अन्य वेद विद्वानों और भाष्यकारों ने विधवा पुनर्विवाह का प्रतिपादन किया है। निम्न मंत्र देखिए -
👇 
‘‘कुह स्विद्दोषा कुह वस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोषतुः।
को वां शत्रुया विधवेव देवरं मंर्य न योषा कृणुते सधस्य आ।
                           (ऋग्वेद, 10-40-2)

‘‘उदीष्र्व नार्यभिजीवलोकं गतासुमेतमुप ‘शेष एहि।
हस्तग्राभस्य दिधिशोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ।।’’

                           (ऋग्वेद, 10-18-8)

उक्त दोनों मंत्रों से जहाँ स्वामी दयानंद सरस्वती ने नियोग प्रथा का भावार्थ निकाला है वहीं #ओमप्रकाश पाण्डेय ने इन्हीं मंत्रों का उल्लेख विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में किया है। 
अपनी पुस्तक ‘‘वैदिक साहित्य और संस्कृति का स्वरूप’’ में उन्होंने लिखा है कि वेदकालीन समाज में विधवा स्त्रियों को पुनर्विवाह की अनुमति प्राप्त थी।

 उक्त मंत्र (10-18-8) का भावार्थ उन्होंने निम्न प्रकार किया है -

‘‘हे नारी ! इस मृत पति को छोड़कर पुनः जीवितों के समूह में पदार्पण करो। तुमसे विवाह के लिए इच्छुक जो तुम्हारा दूसरा भावी पति है, उसे स्वीकार करो।’’

इसी मंत्र का भावार्थ #वैद्यनाथ ‘#शास्त्री द्वारा निम्न प्रकार किया गया है -

‘‘जब कोई स्त्री जो संतान आदि करने में समर्थ है, विधवा हो जाती है तब वह नियुक्त पति के साथ संतान उत्पत्ति के लिए नियोग कर सकती है।’’

उक्त मंत्रों में स्वामी दयानंद ने देवर ‘शब्द का अर्थ जहाँ ‘द्वितीय नियुक्त पति’ लिया है वहीं पाण्डेय जी ने देवर ‘शब्द का अर्थ ‘द्वितीय विवाहित पति’ लिया है।

 निरुक्त के संदर्भ में पाण्डेय जी ने लिखा है कि यास्क ने अपने निरूक्त में देवर ‘शब्द का निर्वचन ‘द्वितीय वर’ के रूप में ही किया है।

 उक्त मंत्रों के साथ पाण्डेय जी ने अथर्ववेद का भी एक मंत्र विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में प्रस्तुत किया है। जो निम्न है -

‘‘या पूर्वं पतिं वित्त्वाथान्यं विन्दते परम्।
पत्र्चैदनं च तावजं ददातो न वि योषतः।।
समानलोको भवति पुनर्भुवापरः पतिः।
योऽजं पत्र्चैदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति।।’’
                        
                                    (अथर्वसंहिता 9-5-27,28)

उक्त से स्पष्ट है कि वेद भाष्यों में इतना अधिक अर्थ भेद और मतभेद पाया जाता है कि सत्य और विश्वसनीय धारणाओं का निर्णय करना अत्यंत मुश्किल काम है?

 यहाँ यह भी विचारणीय है कि विवाह का उद्देश्य केवल संतानोत्पत्ति करना ही नहीं होता बल्कि स्वच्छंद यौन संबंध को रोकना और भावों को संयमित करना भी है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि जो विषय (नारी और सेक्स) एक बाल ब्रह्मचारी के लिए कतई निषिद्ध था, स्वामी जी ने उसे भी अपनी चर्चा और लेखनी का विषय बनाया है।

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