शिव लिंग शिव का प्रतीक या शिव का शिश्न? शिव के प्रतीक का नाम लिंग क्यों रखा और प्रतीक को इसी आकार में क्यों बनाया?
शिवलिंग पर मेरी दो पोस्ट पहले से हैं जो महाभारत और लिंग पुराण पर आधारित थी। दोनो पोस्टों का शिव लिंग का संबंध शिव के शिश्न से ही जुड़ता है। उनके लिंक ये हैं:-
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लोगों के विरोध को देखते हुए, धार्मिक किताबें छापने वाले जो तथ्य पहले थे, उसको बदलते जा रहें हैं। शिव पुराण जो गीता प्रेस गोरखपुर छाप रहा है उसको नाम ही संक्षिप शिव पुराण दिया है यानी उसको छोटा करने के लिए कांट छांट करना जरूरी था, सो शिव लिंग के शिव के शिश्न से जुड़ने वाले संबंध के वर्णन को काट दिया।
नवल किशोर प्रेस लखनऊ ने एक "शिव पुराण भाषा" नाम से पुस्तक का 12 वा संस्करण 1935 में छापा था ( अगर एक संस्करण एक साल में भी छपे तो लगभग 100 साल पुरानी किताब है) जिस पर मेरी आज की पोस्ट आधारित है। इस पुस्तक के 1041 पन्ने हैं। इसमें एक ही कहानी दो अलग अलग खंडों में थोड़े फर्क के साथ लिखी गई है। इस शिव पुराण भाषा ब्रह्मा के नारद के साथ संवाद के रूप में लिखी गई है। पहली कहानी इसके तृतीय खंड के 5 वे अध्याय में है, जिसमें ब्रह्मा जी नारद को बताते हैं कि सती के भस्म हो जाने पर शिव सती के वियोग में दुखी थे तो वह पूर्णतया नग्न हो कर दारुक वन में गए वहां मुनि पत्नियां महा कामिनी हो कर नग्न शिव से लिपटने लगी। तब मुनि लोग जब वहां आए और इस प्रकार का हाल देखा तो क्रोधित हुए और शिव को श्राप दिया जिससे शिव का लिंग धरती पर गिर पड़ा और पाताल में चला गया। ( गौतम ऋषि के श्राप से इंदर के अंडकोष गिर गए थे तो इंद्र को भेड़ के अंडकोष लगाए गए थे). तारे टूट कर गिरने लगे, पर्वत जलने लगे। दुख पा कर मुनि लोग देवलोक भागे लेकिन वहां भी उपद्रव ही उपद्रव तब ब्रह्मा जी कहते है कि वे मेरे पास आए। मुझे भी कुछ समझ नही आया तो विष्णु के पास गए। विष्णु ने दिव्य दृष्टि से कारण जान कर मुनियों को पशु बुद्धि वाला बताया जो शिव को पहचान नही पाए। और बताया कि सभी उपद्रवों का निवारण तभी होगा जब शिव दोबारा अपना लिंग धारण करेंगे।
सब मुनियों, देवताओं, विष्णु ब्रह्मा इत्यादि शिव के पास जा कर लिंग को दोबारा धारण करने के लिय निवेदन किया। शिव ने इस शर्त पर लिंग को धारण किया कि मेरे लिंग की पूजा होगी। तब ब्रह्मा जी बताते है कि हम सबने मिल कर लिंग की पूजा की तब शिव जी प्रसन्न हो गए। ( पन्ना नंबर 1 से 4)
द्वितीय खण्ड के 24 वे अध्याय में भी इसी तरह का संक्षिप वर्णन है। ( पन्ना नंबर 5)
दूसरी कहानी इसी किताब के 8 वे खंड के 16 वे अध्याय में है। इसमें ऊपर वाली कहानी से फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें साफ लिखा है कि मुनि की पत्नियां मैथुन के लिय शिव के सामने गई और काम मूर्छित हो कर गिर पड़ी। जब ब्रह्मा विष्णु इत्यादि ने शिव को दोबारा लिंग धारण करने के लिय निवेदन किया तो शिव ने कहा कि यह उपद्रवी लिंग तब शांत होगा जब गिरिजा ( पार्वती) योनि रूप में लिंग को धारण करे तो शांत होगा। गिरिजा के सिवाय तीनों लोकों में कोन है जो हमारे लिंग को रोक सके। तब ब्रह्मा जी बताते है कि हम सबने फिर गिरिजा को प्रसन्न किया जिसने योनि रूप हो कर शिव के लिंग को धारण किया, तब सबको आनंद आया। परंतु संसार के माता पिता शिव को इस प्रकार नग्न देख कर किसी ने उनकी पूजा नही की तब शिव ने आज्ञा दी कि हमारे लिंग की पूजा करो। तब सबने इसी रूप की पूजा की। तब से पूजा चल पड़ी। ( पन्ना नंबर 6 से 8)
पन्ने भी पोस्ट किए हैं।
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