Tuesday, 9 August 2022

ब्राह्मण। शुद्र।

महाभारत ब्राह्मणवाद का षडयंत्र

महाभारत एक प्रसिद्ध ग्रंथ है लेकिन इसमे लिखी बहोत सारी बाते संविधान के समानता के मुल्यो के खिलाफ है.
मनुस्मृति लिखने वाले मनु को भी शर्म आ जाये ऐसे श्लोक हमे महाभारत मे देखने को मिलते है.
महाभारत का अनुशासन पर्व अध्याय 33,34,35 पुरे ब्राह्मणो कि प्रशंसा से भरे है उस मे से कुछ श्लोक का उल्लेख यहा करते है.

अध्याय 33 के अनुसार

 राजा का मुख्य कर्तव्य है कि वो ब्राह्मणो कि सेवा करे. सुख कि इच्छा रखने वाले राजा को यही करना चाहिए (श्लोक 2)

राजा के लिए ब्राह्मण पिता समान पूजनीय वंदनीय और माननीय है(श्लोक 7)

बडे बडे साहसी भी इनसे भय मानते है क्योंकी इनके भितर गुण अधिक होते है(श्लोक 10)
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अनेक क्षत्रिय जातींया ब्राह्मणो कि कृपा दृष्टी न मिलने से शुद्र हो गयी(श्लोक 22)

ब्राह्मणो से हार मान लेने मे हि कल्याण है उन्हें हराना अच्छा नही है(श्लोक 23)

जो संपूर्ण जगत् को मार डाले तथा ब्राह्मण का वध करे उन दोनो का पाप समान हि है. महर्षीयों का कहना है कि ब्रह्महत्या महान दोष है(श्लोक 24)

ब्राह्मणो कि निंदा कभी नही सुननी चाहिए जहा उनकी निंदा होती है वहा से चला जाना चाहिए(श्लोक 25)

इस पृथ्वी पर ऐसा कोई मनुष्य न तो पैदा हुआ है न होगा जो ब्राह्मणो का विरोध करके सुखपुर्वक जिवित रहने का साहस करे (श्लोक 26)

हवा को मुठ्ठी मे पकडना,चंद्रमा को हात से छुना,पृथ्वी को उठाना अत्यंत कठिन काम है,उसी तरह ब्राह्मणो को जितना अत्यंत दुष्कर है (श्लोक 27)
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अब अध्याय 34 के कुछ श्लोक देखे

राजा उत्तम भोग आभुषण तथा मनोवान्छित पदार्थ देकर नमस्कार आदि करके ब्राह्मणो कि पुजा करे और पिता के समान उनके पालन पोषण का ध्यान दे(श्लोक 2)

ब्राह्मणो को जो कुछ अर्पित किया जाता है उसे देवता ग्रहण करते है क्योंकी ब्राह्मण समस्त प्राणीओ के पिता है उनसे बढकर कोई दुसरा प्राणी नही(श्लोक 5)
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मनुष्यों को ब्राह्मणो कि सेवा करनी चाहिए, यही सबसे पवित्र और उत्तम कार्य है. ब्राह्मणो कि सेवा करने से रजोगुण नष्ट हो जाता है,इसी से उत्तम बुद्धी भी प्राप्त होती है(श्लोक 22)
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अध्याय 35 के कुछ श्लोक देखे

ब्राह्मणो का विरोध करके भुमंडल का राज्य नही चलाया जा सकता, क्योंकी महात्मा ब्राह्मण देवताओ के भी देवता है(श्लोक 21)

यदि राजा को समुद्रपर्यंत पृथ्वी का राज्य भोगना है तो दान और सेवा के द्वारा सदा ब्राह्मणो कि पुजा करनी चाहिए (श्लोक 22)
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(देखे 👉 महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 33,34,35)

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Sc st obc के साथ साथ तथाकथित क्षत्रियों से भी मेरा सवाल है कि यदि आप खुद को हिंदु मानते हो तो महाभारत के इन अध्यायों से आप सहमत हो या नही.
अगर आप हिंदु हो तो आपको महाभारत के इस उपदेश को फौलो करना चाहिए


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*जिस धर्म के धर्मसास्त्रों में ऐसी बातें लिखी है,

1 - मेरी शरण में आकर स्त्री ,वैश्य , शूद्र भी जिन कि उत्त्पति पाप योनि से हुई है, परम  गति को प्राप्त हो जाते है। 
           -:भगवत गीता 9-32

2  - शूद्र का प्रमुख कार्य तीनों वर्णो की सेवा करना है।
         -: महाभारत  4/50/6 

3 - शूद्र को सन्चित धन से स्वामी कि रक्षा करनी चाहिये। 
    -:  महाभारत 12/60/36

4 - शूद्र तपस्या करे तो राज्य निर्धनता में डूब जायेगा।
      -: वाo .रामायण 7/30/74

5 - ढोल .गवार .शूद्र पशु नारी  |
 सकल ताड़ना के अधिकारी ||
       -: रामचरित मानस 59/5

6 - पूजिये विप्र सील गुन हीना, शूद्र न गुण गन ग्यान प्रविना। 
            -:रामचरितमानस 63-1

7- वह शूद्र जो ब्राम्हण के चरणो का धोवन पीता है राजा उससे कर TAX न ले।
 -: आपस्तंबधर्म सूत्र 1/2/5/16

8 - जिस गाय का दूध अग्निहोत्र के काम आवे शूद्र उसे न छुये।  
  - : कथक सन्हिता 3/1/2

9 - शूद्र केवल दूसरो का सेवक है इसके अतिरिक्त उसका कोइ अधिकार  नही है।
  -: एतरेय ब्राम्हण 2/29/4

1o-  यदि कोइ ब्राम्हण शूद्र को शिक्षा दे तो उस ब्राम्हण को चान्डाल की भाँति त्याग देना चाहिये। 
    -: स्कंद पुरान  10/19

11 - यदि कोइ शूद्र वेद सुन ले तो पिघला हुआ शीशा, लाख उसके कान में डाल देना चाहिये। 
यदि वह वेद का उच्चारण करे तो जीभ कटवा देना चाहिये। वेद स्मरण करे तो मरवा देना चाहिये।
  -: गौतम धर्म शूत्र 12/6 

12 - देव यज्ञ व श्राद्ध में शूद्र को बुलाने का दंड 100 पर्ण।
     - : विष्णु स्मृति 5/115

13 - ब्राम्हण कान तक उठा कर प्रणाम करे, क्षत्रिय वक्षस्थल तक, वैश्य कमर तक व शूद्र हाथ जोड़कर एवं झुक कर प्रणाम करे।
 -: आपस्तंब धर्म शूत्र 1,2,5,/16

14 - ब्राम्हण की उत्पत्ति देवता से, शूद्रो की उत्पत्ति राक्षस से हुई है।
 -: तेत्रिय ब्राम्हण 1/2/6/7

15 - यदि शूद्र जप ,तप, होम करे तो राजा द्वारा दंडनिय है।
  -: गौतम धर्म सूत्र  12/4/9 

16- यज्ञ करते समय शूद्र से बात नहीं करना चाहिये।
  -: शतपत ब्राम्हण


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ताडना शब्द का सही अर्थ

#भुमिका. .....,. Napunsak Vedic ishwar h

तुलसिदास रामायण मे एक 'चौपाई' है

ढोल गंवार शुद्र पशु नारी ये सब ताडन के अधिकारी
(सुंदरकांड 61/3)

इसपर दलित,मुलनिवासी,बहुजन,फेमिनिस्ट,बुद्धीवादी,नास्तिक,उदारमतवादी ,इत्यादी सब आक्षेप लेते है

इसलिए धर्म कि इज्जत बचाने के लिए  संघी मनुवादी,कथावाचक बाबा पंडे-पुरोहित इन्होंने एक युक्ती खोज निकाली ताडन शब्द का मनमाना अर्थ लगाकर आम लोगो कि आंखो मे धुल झोंकना.
इसपर अनेक युट्युब व्हिडीओ बनाये गये है
लेख लिखे गये है. Facebook whats app पर अनेक काॅपी पेस्ट भी वायरल है

इसलिए व्यापक स्तरपर होने वाले  इस दुष्प्रचार का खंडन होना आवश्यक है

#आप्टे_कोश

आप्टे संस्कृत-हिंदी कोश के  अनुसार ताडन शब्द का अर्थ है 👇

मारने-पीटने की क्रिया या भाव 2. किसी को दिया जाने वाला दुख या कष्ट 3. किसी को उत्पीड़ित या परेशान करने की क्रिया 4. प्रहार; आघात। [क्रि-स.] 1. भाँपना; छिपी हुई बात समझना 2. सुधार के उद्देश्य से सज़ाया दंड देना 3. किसी को अपशब्द कहना 4. कष्ट देना।

#नालंदा_विशाल_शब्दसागर

नालंदा विशाल शब्द सागर(पृष्ठ 510) अनुसार

ताडना(संज्ञा,स्त्री) 1.मार,प्रहार 2.डांट डपर,दंड शासन,धमकी 3.उत्पिडन कष्ट 4. मारपिट कर भगाना 4. कष्ट पहुंचाना

  इस से सिद्ध है कि ताडना शब्द मारने पिटने से हि संबंधीत है. इसका अगल अर्थ लगाकर सत्य नही बदला जा सकता.
क्योंकी रामचरित्रमानस मे शुद्र और स्त्रीओ के लिए नफरत अन्य स्थानो पर भी दिखती है

#इतर_कांड

बालकांड मे तुलसिदास लिखते है

नारी स्वभाव से हि मुर्ख और नासमज होती है
(बालकांड 143/2)

स्त्री स्वभाव से हि अपवित्र होती है
(अरण्यकांड 6)

नारी अवगुणो कि जड पिडा देने वाली और सब दुखों कि खान है
(अरण्यकांड 55)

नारी स्वतंत्रता के पात्र नही.
(किष्किंधाकांड 16/4)

नारी का ह्रदय कपटों पापों और अवगुणों कि खान है.
(अयोध्याकांड 162/2)

#शुद्र_द्वेष

तुलसिदास शुद्र जातीओ पर लिखते है

तेली कुंभार श्वपच किरात कलार आदि निच वर्ण है
(उत्तरकांड 157/3)

शुद्र यदि गुणवान और ज्ञानी भी हो तो भी उसका पुजन नही करना चाहिए.
(अयोध्याकांडा 40/1)

संसार मे एक ही पुण्य है, मन कर्म वचन से ब्राह्मणों कि पुजा.
(उत्तरकांड 67/4)

शुद्र कलियुग मे ब्राह्मणों को उपदेश दे रहे है और जनेऊ पहनकर दान ले रहे है जिसके वे पात्र नही.
(उत्तरकांड 99(ख) 1)

#निष्कर्ष

ताडना शब्दका अर्थ बदलनेकी कोशिश करने वालो का इसपर क्या मत है
स्त्री शुद्र के बारे मे नफरत तो  रामचरित्रमानस मे अन्य स्थानो पर भी है
धर्मकी इज्जत बचाने के लिए आप किस किस शब्द का अर्थ बदलोगे?

ताडना शब्द का अर्थ बदलनेकी  कोशिश करना मतलब 21 वी सदी मे कालबाह्य धर्मकी इज्जत बचाने कि कोशिश करना है



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राजपूताना बोर्ड में आजादी से पहले तुलसी रामायण की सुंदर काण्ड का पाठ स्कूल का पाठ्यक्रम था। उसी में यह सिखाया जाता था कि शुद्र पीटने पर ही मानता है।

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बामनवाद खंडन
बामनो के पाखंड का भांडा फोड

बामनो ने शूद्र अति शूद्रो पर अत्याचार कैसे किए?
March 19 /2022

बहोत सारे लोगों के दिमाग में ये सवाल जरूर आया होगा कि शूद्र अति शूद्र संख्या में ज्यादा होने के बावजूद कोई उनपर अत्याचार कैसे कर सकता है। 

उन्होंने उसके खिलाफ कोई विद्रोह क्यों नहीं किया ? 

आज इसी बात का विश्लेषण हम करेंगे 

सबसे पहले तो हमें ये जान लेना चाहिए की किसी भी समाज या व्यक्ति का नैतिक दृष्टिकोण उतना ही विकसित होता है जितना उसे प्रकृति और विज्ञान के नियम पता होते है 

आज कोई शूद्र नहीं मानेगा की उसकी उत्पत्ति ब्रह्मा के पैर से हुई है।

और ना ही कोई शूद्र अति शूद्र ये मानेगा की पिछले जन्म के पाप के कारण उसे शूद्र अति शूद्र वर्ण में जन्म मिला है। 

क्युकी उसके पास अब प्रकृति और विज्ञान की वो जानकारी है जिससे वो पुरानी धारणाओ को नहीं मनेगा और उसे गलत भी साबित करेगा। 

लेकिन जब प्रकृति और विज्ञान के नियम जब भारतीय लोगों को पता नहीं थे तब भारतीय समाज में कौनसी धारणा रही होगी ? 

जिस वर्ग के पास ज्ञान का एकाधिकार था उस वर्ग ने लोगो के दिमाग में क्या क्या धारणा  डाली होगी ? 

इसकी शुरुवात होती है तब जब आर्यो के ही एक धूर्त कपटी वर्ग ने उनको ब्रह्म का ज्ञान हुआ है और उनका जन्म ब्रह्मा के मुख से हुआ है ये दावा करके खुदको ब्राह्मण शब्द से चिन्हित करके बाकीओ से अलग कर लिया 

अब कोई वर्ग खुदको दुसरो से उपर तभी दिखा सकता है जब वो सामने वाले मनुष्यो को भी किसी और शब्द से चिन्हित करके उन्हें अपने से अलग रखे 

यह व्यवस्था थोपना राजाश्रय के बिना संभव नहीं है ये बात बामन जानते थे 

इसलिए राजाओ का ब्रेन वाश करना बेहद जरूरी था

राजाओ को उनकी व्यवस्था स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं थी क्युकी उस व्यवस्था से उनका भी वैश्य शूद्र,अति शूद्रो पर वर्चस्व रहने वाला था। 

अब राज्य व्यवस्था को चलाने के लिए लिखे जा रहे थे धर्मसुत्र और स्मृति ग्रंथ जिसमें शूद्र और अति शूद्र पर तरह तरह की पाबंदियां थी। 

पुरुष सुत्त द्वारा वर्ण व्यवस्था को धार्मिक मान्यता पहले से ही दी गई थी। 

दर्शन उपनिषद् के कर्म फल, पुनर्जन्म सिद्धांत का भी बामनो ने इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए इस्तेमाल किया। 

जैसे छान्दोग्य उपनिषद् 5-10-7 में लिखा है, 

पिछ्ले जन्म में पुण्य कर्म करने से उच्च वर्ण में जन्म मिलता है, पिछले जन्म पाप करने से शूद्र या चांडाल का जन्म मिलता है। 

दार्शनिक और ग्रंथ लेखक सभी बामन थे, उन्होंने ये धारणा बनाई थी वर्ण व्यवस्था अनादि काल से चली आ रही है और ईश्वर कृत है,

आपको कर्म फल के अनुसार अच्छे बुरे वर्ण में जन्म मिलता है

चार्वाक और बुद्ध ने इस सिद्धांत को चुनौती ज़रूर दी लेकिन समाज में उनके सिद्धांतों को मान्यता नहीं मिली। 

भारतीय समाज में सदियों तक से धारणा बनी रही की जिस वर्ण में जन्म होता है वो हमारे पिछ्ले जन्म का फल है। 

क्युकी भारतीय लोगों को तब प्रकृति और विज्ञान के नियम पता थे ही नहीं की  इस सिद्धांत को गलत माने। 

1925 में भारत आयी अमेरिकन यात्री कैथरीन मेयो आपनी मदर इंडिया पुस्तक में लिखती है अछूत खुद ये मानते है कि उन्हें पिछले जन्म में किए पाप के कारण अछूत जन्म मिला है।

बामनो द्वारा राजश्रय का आधार लेकर जो धारणाये फैलाई गई थी वहीं  उस समय की सामाजिक मान्यताएं थी, और धर्म ग्रथ लेखक भी बामन होने के कारण उसे धार्मिक मान्यता थी, राज्य व्यवस्था जिन स्मृति ग्रंथो से चलती थी उसने इस व्यवस्था को कानूनन मान्यता प्रदान कि थी। 

राजा भले ही नॉन ब्राह्मण हो लेकिन सेनापति, प्रधान मंत्री और पूरा मंत्री मंडल बामनो से भरा होता था। 

जो कि अपने वर्ग के हितों की रक्षा के लिए हमेशा जागृत रहते थे। 

अब सवाल ये है कि इस व्यवस्था से शूद्र और अति शूद्रो पर अत्याचार किस तरह से हुए 

अत्याचार का मतलब सिर्फ ये नहीं होता कि आप किसी को लाठी से पिटे। 

अत्याचार कई तरह के होते है, 

खुदको एक अलग शब्द से चिन्हित करके सारे विषेशाधिकार अपने पास रखना और दूसरे वर्ग को उनके मूलभूत अधिकारों से भी वंचित रखना यही सबसे बड़ा अत्याचार है। 

शूद्र अति शूद्रो के लिए स्मृति ग्रंथो में क्या क्या नियम है, बामन वर्ण के लिए क्या क्या विशेषाधिकार है इसपर पहले से ही बहुत सारे आर्टिकल्स गूगल पर उपलब्ध है, 

इसलिए हम इस बारे मी ज्यादा नहीं लिखेंगे। 

अब कुछ लोगों के दिमाग में ये सवाल आ रहा होगा कि मध्य काल में मुस्लिम राजाओ का शासन था तब शूद्र अति शूद्रो पर अत्याचार कैसे हुए ? 

इसका जवाब हमें मिलेगा डॉ बाबासाहेब आंबेडकर समग्र वाड़मय हिंदी, खंड 10 से 

जैसे कि हम पहले ही बात कर चुके है वर्ण व्यवस्था/जाती व्यवस्था को केवल दार्शनिक और कानूनन मान्यता ही नहीं धार्मिक मान्यता भी थी 

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर इसपर कहते है, 

यह मानना पड़ेगा कि जाति की गाड़ी को आगे चलाते रहने वाले दो शक्तिशाली इंजन थे - कानून और धर्म , निस्संदेह इन दोनों में से धार्मिक मान्यता प्रमुख मान्यता थी

(डॉ बाबासाहेब आंबेडकर, समग्र वाड़मय, हिंदी, खंड 10 पृष्ठ 66)

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कुल मिलाकर बात ये है मध्य काल में सत्ता मुस्लिम राजाओं की जरूर रही लेकिन बामन धर्मी लोगों में जो दार्शनिक और धार्मिक मान्यताएं थी वो जैसे कि तैसी बनी रही। 

वो दार्शनिक धार्मिक मान्यता जैसे कि हमने ऊपर ही बताया है, आपका जन्म जिस वर्ण/ जाती में हुआ है वहीं काम आपको करना है और ये आपके पिछले जन्म के कर्म का फल है। 

आपका जन्म अछूत जाती में हुआ है तो आपको ज़िन्दगी भर अछूत बनकर ही रहना होगा ये आपके पिछले जन्म के कर्मो का फल है

कौन बामन होने के सारे फायदे उठाने वाला है और कौन ज़िन्दगी भर अछूत बनकर रहने वाला है ये बात मां के पेट से ही तय होती थी

समय आगे बढ़ता गया और अंग्रेज़ो के साथ एक नई शिक्षा नीति भारत आयी, 

जिसमें पढ़ने वाले भारतीयों को प्रकृति और विज्ञान की बहुत सारी बाते समज आ रही थी, 

समाज में फैली हुई बहुत सारी धारणाएं, रूढ़ि, परम्परा, कुप्रथा बुद्धिजीवी लोगों को गलत लगने लगे थे। 

यही कारण है कि सवर्ण समाज सुधारक अंग्रेज़ो के काल में हुए। 

फूले, बाबासाहेब आंबेडकर जैसे क्रांतिकारी भी अंग्रेज़ो की आधुनिक शिक्षा के कारण ही बने

इस तरह से हम देखते है की हम किसी धारणा, रूढ़ि, परम्परा, कुप्रथा को हम तभी चुनौती दे सकते है जब हमारे पास वो आधुनिक शिक्षा हो जिससे हमें प्रकृति और विज्ञान के नियम को समझें और पुरानी सभी धारणाओं को चुनौती दे। 

शूद्र अति शूद्रों के लिए ऐसा करना अंग्रेज़ो के काल से पहले असंभव था 

क्षत्रिय राजाओं द्वारा भी वर्ण व्यवस्था के सभी नियमों को कानूनन मान्यता थी, 

दार्शनिक और धार्मिक मान्यता के कारण वो सारे नियम अंग्रेज़ो के काल तक चलते रहे जब तब आधुनिक शिक्षा से हमें प्रकृति और विज्ञान के नियम पता नहीं चले। 

इसलिए बामनों ने कानूनन, दार्शनिक, धार्मिक मान्यता के आधार पर शूद्र अति शूद्रो पर हजारों साल तक अत्याचार किए इस सत्य को कोई नहीं नकार सकता

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