कहते लोग जब नशा करता है तब उसे कुछ भी याद नहीं रहता है,।
यह बात हमारे महा ऋषि दया नंद के साथ भी हुआ क्यों के वो भी भंग और हुलास का सेवन करते थे ।
।
दयानंद ने ऋग्वेद भाष्य भूमिका चैप्टर वेद संज्ञा विचार में लिखते हैं की ब्राह्मण ग्रन्थ वेद हैं यह बात सिर्फ कात्यान ऋषि ने बोला हैं और कोई दूसरा ऋषि ने नही बोला हैं ऐसा ।
।
।
अब देखो दया नंद ने उनके भर्मचेदन ग्रंथ पेज नंबर 396 में लिखते हैं की कात्यान ने ऐसा नहीं बोला , ऐसा नहीं लिखा है किसी दूसरे ने लिखा होगा
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देखो इस फ्रॉड गुदा नंद का कारनामे इसने हिंदू देवता भगवान शिव को हिजड़ा बोला हैं ,
यह आपने जीवन चरित में लिखा है यह बात,,
,
यह फ्रॉड हिंदू का मूर्ति पूजा खंडन के लिए डिबेट करने गए थे और यह आर्गुमेंट्स रखते हैं शिव हिजड़ा हो गया
इसे डिबेट करने का वसूल तक पता नहीं था ,
So Called Maharishi को डिबेट में कैसे आर्गुमेंट रखा जाता है और कैसा शब्द का इस्तेमाल किया जाता हैं।
यह आपने जीवन चरित में लिखा है यह बात,,
,
यह फ्रॉड हिंदू का मूर्ति पूजा खंडन के लिए डिबेट करने गए थे और यह आर्गुमेंट्स रखते हैं शिव हिजड़ा हो गया
इसे डिबेट करने का वसूल तक पता नहीं था ,
So Called Maharishi को डिबेट में कैसे आर्गुमेंट रखा जाता है और कैसा शब्द का इस्तेमाल किया जाता हैं।
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आर्य समाजियों का जीव आत्मा, परात्मा के अंदर चला जाता है थोड़ा टाईम के लिए और फिर बाहर आ जाता है।
वाह रे फ्रॉडो इधर जीव आत्मा से परात्मा को यूनाइटेड कर दिया,, पगन कांसेप्ट भर दिया गुदा नंद ने
********
पदार्थ:-
अग्नि के लिए मुर्गा,
अग्नि और सोम के लिए नीलकंठ पक्षी
सूर्य और चंद्रमा के लिए मयूर(मोर)
मित्र और वरुण के लिए कबूतर
******
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Oppenheimer ने गीता से प्रेरित हो कर एटॉम बॉम्ब बना दिया
अच्छा हुआ उसने फ्रॉड समाजी वेद नही पढ़ा नहीं तो
हाइड्रोजन बॉम्ब बना देता ।
अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:9» पर्यायः:0» मन्त्र:19
।
(न्यर्बुदे) हे न्यर्बुदि ! [निरन्तर पुरुषार्थी प्रजागण] (प्रब्लीनः) घिरा हुआ, (मृदितः) कुचला हुआ (हतः) मारा गया (अमित्रः) वैरी (शयाम्) सो जावे। (अग्निजिह्वाः) अग्नि की जीभें [लपटें] और (धूमशिखाः) धुएँ की चोटियाँ [आग्नेय शस्त्रों से] (सेनया) सेना द्वारा (जयन्तीः) जीतती हुई (यन्तु) चलें ॥१९॥
भावार्थभाषाः - धर्मात्माओं के सेना दल आग्नेय आदि शस्त्रों को जल, थल और आकाश से इस प्रकार छोड़ें कि शत्रु लोग रुन्ध-खुँद कर मर जावें ॥१९॥
*****
****
Dayanand VS Ved
Satyarath Prakash Chapter 4 Ma Leekhta H ,,
Newborn Baby Ko 6 Din K Bad Maa Aapne Doodh Na Pilaye ,
Aur Ved Ma Leekha H Maa K Doodh K Sahare Balak Sote H,,
Dayanand Ne Kabhi Khud Ka Translation Bhi Padha Nhi Hoga Thik Se ,,,
- Dayanand's YajurVeda :- 38.5
हे बहुत विज्ञानवाली स्त्री
जो तेरा यह स्तन है वो दूध का आधार है, सुख सिद्ध करनेहारा है, उत्तम गुणों को धारणकर्ता है और धनों को प्राप्त होने वाला है ।
******
आर्य समाजी शुद्ध रामायण
इनका शुद्ध रामायण का आरंभ भी अल्लाह के नाम से ही होता है।।
शुद्ध रामायण –आचार्य प्रेम भिक्षु आर्य समाजी
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ऋग्वेद 10/89/08 के अनुसार तो वेडिक ईश्वर आपने भक्तों का पाप नष्ट कर देते है यानी माफ़ कर देते हैं।
******
ccording To Fraud Guda Nand Saraswati
99.99% Hindus Will Go To Hell, Bcz They Are Idol Worshipper,
Yaha Tak Ki Dayanand Ka Maa Baap Bhi
Ved Viroodhi K Sath Narak Gaami H,,, 


Satyarath Prakash Chapter 11 Page Number 258(Pdf)
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धन प्राप्ति के लिए यह एक अरब ९६ लाख करोड़ सालो से मार काट करते आए होंगे
वेद अनुसार ।।
क्यों के बिना युद्ध के तो धन प्राप्ति नहीं होता
गुदा नंदी को Horse Power चाहिए सेक्स के लिए।
अथर्व वेद 4/4/1 –8
कमेंटेटरी
पंडित जयदेव शर्मा
देवी चांद
आचार्य वैद्यनाथ
अथर्व वेद 4/4/1 –8
कमेंटेटरी
पंडित जयदेव शर्मा
देवी चांद
आचार्य वैद्यनाथ
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आर्य समाजियों का आर्ष ऋषि अपस्तंब सूत्र
में घोड़े के साथ सेक्स,, अश्वमेध यज्ञ में घोड़े से स्त्री के साथ सेक्स किया जाता था ।
अपस्तंब सूत्र से बहुत सारे रेफरेंस फ्रॉड दयानंद ने उनके Jiyan Aur Vijjyan
सत्यारथ प्रकाश में कोड किया था ।
और दयानंद ने भी खुद स्वीकार किया सत्यारथ प्रकाश चैप्टर ११ में की किसी गोरख पूर का राजा ने आपने रानी को घोड़े के साथ पोपो कराया था
Sabhi Gau Mata Aur Bakre Premi K Liye!!
Eid AA Rha H Na.
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युवती पत्नी को गृहस्थ स्नेह से चाटता है
कौनसी चीज़ चाटता हैं पति पत्नी का?
युवती पत्नी को गृहस्थ स्नेह से चाटता है
कौनसी चीज़ चाटता हैं पति पत्नी का?
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सोम रस निचोड़ा कैसे जाते हैं देख लो ।
गाय का चमड़े से सोम रस निचोड़ा जाते हैं।
जियान और विज्यान का किताब में लिखा है
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लिंग को धनुष जैसा बनाओ 

जियान विजयन
वेद मंत्र द्वारा वैदिक ईश्वर को बुला कर साक्षात किया जा सकता है ।
वो सामने प्रकट हो जाता है 
गुदा नंदी ऋग्वेद 10/118/2
पदार्थ -
(सः-अग्निः) वह परमात्मा या अग्नि (ईळेन्यः) स्तुति करने योग्य या उपयोग में लाने योग्य (गिरा-आहुतः) स्तुति द्वारा आमन्त्रित या मन्त्रवाणी द्वारा प्रज्ज्वलित किया (वि रोचते) विशेषरूप से साक्षात् होता है या प्रकाशित होता है (स्रुचा) स्तुति से या मन्त्रवाणी से (प्रतीकम्) प्रत्यक्ष या सामने (अज्यते) प्राप्त होता है या प्रकट होता है ॥२॥
.
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वेद और नारी
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फ्रॉड गुदा नंदी एक बात बहुत चिल्लाते हैं की देखो हमारे वेदों में तो नारियों का बहुत अधिकार दिया गया है।
।
और यह बात बोलने वाले ज्यादातर शुद्र ही होते हैं (जिसे दयानंद ने खुद आपने बाईबल ऑफ हेट चुटियाअर्थ प्रकाश में वेद पढ़ने को निषेध किया हुआ हैं ) जो अब दया नंदी बन कर और चुटियार्थ प्रकाश पढ़ कर खुद को विज्ञानी समझता है और वेद तो कभी पढ़ा नहीं होगा , पढ़ना तो दूर की बात शकल भी नहीं देखा होगा ।
।
वेदों का ध्यान से अध्ययन करने से पता चलता है की वेदों में किसी भी प्रकार का कोई भी अधिकार नही है नारियों का ।
लेकिन कुछ अधिकार दिया गया है जिसे कोई नकार नहीं सकते जैसे
वेदों में नारियों का पुनर विवाह का अनुमति नहीं लेकिन नियोग का हैं
वो भी 11/11 मर्दों से ।
।
वेद अनुसार कोई भी नारी आपने पति को छोड़ नहीं सकती पति कितना अत्त्याचारी क्यों न हो लेकिन वो किसी दूसरे मर्द से नियोग कर सकती हैं ।
ठीक उसी तरह मर्द भी बीवी रहते हुए भी किसी दूसरी विधवा औरत से नियोग कर सकती हैं वो भी 11/11 विधवा औरतों से ।
।
वैसे तो वेदों में अनेक मंत्र मिल जायेंगे सिर्फ लड़का –पुत्र पैदा करने के लिए सिर्फ इन्हे लड़का चाहिए लड़की नहीं।
लेकिन वेदों में पुत्री पैदा करने का कोई मंत्र नही मिलेगा ।
।
मनुस्मृति में मनु महाराज ने बोला वेदों में जहा जहा पुत्र शब्द का इस्तेमाल हुआ या पुत्र उत्त्पति का प्राथना किया गया है वहा पुत्र शब्द का इस्तेमाल सिर्फ लड़का बच्चा पैदा करने के लिए हैं –विशुद्ध मनुस्मृति 9/137
स्वयंभू ईश्वर ने वेदों में बेटे को ’पुत्र’ संज्ञा से अभिहित किया है (द्रष्टव्य है—’सर्वेषां तु स नामानि.............वेदशब्देभ्य एवादौ.............निर्ममे’ ।
।
अथर्व वेद 6/11/3 में लिखा है की अन्य दशा में स्त्री गर्भ में कन्या संतान ही धारण करे लेकिन उक्त प्रकार अनुभव करने पर भी स्त्री पुत्र का ही धारण करता है। पंडित जयदेव शर्मा आर्य समाज,
आचार्य वैद्यनाथ आर्य समाज
Translation
पुरुष (वह) पिता और आज्ञाकारी स्त्री, माता इस प्रकार पुत्र उत्पन्न करती है और कन्या अन्यथा। लेकिन इस (निर्धारित) प्रक्रिया से वे नर बच्चे को पाती हैं।
Male, The Father And obedient female, The Mother Produce Son In This Way And The Female Child Otherwise. BUT
By This (prescribed) Procedure They Find Male Child.
।
दस दस पुत्र यानी नर बच्चे पैदा करे ।
ऋग्वेद 10/85/45
मीढ्वः-इन्द्र त्वम्) हे वीर्यसेचक ! ऐश्वर्यवन् ! तू (इमां सुपुत्रां सुभगां कृणु) इस वधू को शोभन पुत्रोंवाली अच्छी सोभाग्यवती कर (अस्यां दश पुत्रान्-आ धेहि) इस में दस पुत्रों का आधान कर (एकादशं पतिं कृधि) दश के ऊपर अपने को-पति को समझ ॥४५॥
भावार्थभाषाः -पति को चाहिए कि पत्नी को सौभाग्यपूर्ण प्रशस्त पुत्रोंवाली बनावे, दस पुत्रों को उत्पन्न करे, अधिक नहीं, अथवा दस बार गर्भाधान करे, अपने को ग्यारहवाँ पालक समझे ॥४५॥
इस मंत्र में पुत्र शब्द आया है अब कोई गुदा नंदी आ कर बोलेगा की देखो पुत्र शब्द लड़का लड़की दोनो के लिए हैं।
जो की एक झूठ बात हैं मनु अनुसार वेदों में पुत्र शब्द नर बच्चा के लिए आया हैं –विशुद्ध मनुस्मृति 9/137
स्वयंभू ईश्वर ने वेदों में बेटे को ’पुत्र’ संज्ञा से अभिहित किया है (द्रष्टव्य है—’सर्वेषां तु स नामानि.............वेदशब्देभ्य एवादौ.............निर्ममे’
अब देखते हैं वेदों में नारिओ का और क्या क्या अधिकार दिया गया है
क्या वेदों में नारियों का संपति रखने का अधिकार है ?
क्या नारियों को हसबैंड और आपने बाप का संपति पे कोई अधिकार हैं ?
जवाब नहीं वेदों में नारियों को संपति रखने का अधिकार नहीं दिया गया ।
वेदों और वेदों का कोष निरुक्त में लड़कियों के लिए दुहिता शब्द का व्यवहार हुआ है दुहिता का अर्थ यास्क ने निरुक्त 3/4 में लिखा है की
दुर्दिता = जिसकी भलाई करना या जिसे प्रसन्न करना कठिन
है ।
कितनो भी भलाई की जाए इन्हें प्रसन्न करना कठिन है । दूरे हिता = पिता से दूर रहने पर ही पिता का कल्याण है | दुह् = पिता से बराबर घन दूइती
रहती हैं।
ऋग्वेद 3/31/2
आचार्य श्री राम शर्मा
न जामये तान्वो रिक्थमारैक्चकार गर्भं सनितुर्निधानम् ।
यदी मातरो जनयन्त वह्निमन्यः कर्ता सुकृतोरन्य ऋन्धन् ॥ २ ॥
भाई अपनी बहिन को पैतृक धन का भाग नहीं देता; अपितु उसको पति के लिए नव निर्माण करने में सक्षम
बनाता है। माता-पिता पुत्र और पुत्री को उत्पन्न करते हैं, तो उनमें से एक (पुत्र) सर्वोत्कृष्ट पैतृक कर्म सम्पन्न करता
है और अन्य (पुत्री) सम्मान युक्त शोभा को धारण करती है ॥ २ ॥
ऋग्वेद 3/31/2
पंडित जयदेव शर्मा आर्य समाज
भा० – ( तान्वः ) देह से उत्पन्न हुआ पुत्र (जामये) अन्यों के
लिये पुत्र उत्पन्न करने वाली अपनी भगिनी को ( रिक्थं) पिता का धन
(न आरैक् ) नहीं प्रदान करे । प्रत्युत वह उस अपनी भगिनी को ( सनितुः ) उसके भोक्ता, पाणिग्रहीता पति के लिये ( गर्भ निधानं चकार )
गर्भ धारण करने योग्य ( चकार ) बनावे । ( यदि ) यद्यपि ( मातरः )
माता पिता लोग ( चह्निम् जनयन्त) पुत्र पुत्री दोनों को ही पुत्र रूप से
या सन्तान रूप से उत्पन्न करते हैं तो भी उन दोनों में से ( अन्यः )
एक पुत्र ही ( सुकृतोः ) पिता के लिये सुखकारी कार्य पोषणादि का
( कर्त्ता) करने हारा होता है। और ( अन्यः) दूसरी कन्या (ऋन्धन)
केवल सुसम्पन्न सुभूषित मात्र ही करदी जाती है और दूसरे को दे दी
जाती है। जिस प्रकार विद्वान् लोग अग्नि को उत्पन्न करते हैं जिनमें से
एक केवल चमकाता प्रकाश देता है दूसरा यज्ञ को करता है। उसी प्रकार
एक कुल को पालता पोषता दूसरा केवल मात्र सजाता ही है ।
.
आचार्य यास्क ने निरुक्त 3/6 में ऋग्वेद का इस मंत्र का एक्सप्लेन किया है की – कन्या केवल पाली पोसी जाती है।
नहीं, भगिनी के लिए ( तान्य: ) औरस पुत्र अर्थात् उस
भगिनी का भ्राता ( रिक्थम् ) दाय धन को (क) नही देता, छोड़ता ।
[ उस भाई ने ] किया, बना दिया (गर्भम् ) बहन के गर्भ को [ होने वाली
सन्तान द्वारा ] ( सनितु ) उस के हाथ पकड़ने वाले, उस के पति का
( निधानम् ) निधि स्थान | जो ( मातरः ) माताओं ने ( जनयन्त=
अजनयन्त ) उत्पन्न किया ( वह्निम् ) पुत्र को, [ और कन्या को तो ]
(अन्य ) उन पुत्र और कन्या में से एक ( कर्ता ) सन्तानकर्ता [ होता है ]
( सुकृतो:=मुकृतयोः ) उन दोनों भले प्रकार उत्पन्न किए गयों में से ।
[ और ] दूसरा ( ऋन्धन् ) पाला पोसा जाता है, अर्थात् कन्या केवल पाली
पोसी जाती है ।
और निरुक्त 3/5 में लिखा है जिस लड़की की कोई भाई नहीं उससे कोई शादी न करे ।
अगर कोई करे तो उसे पुत्रिका करना होगा ,
पुत्रिका मतलब उस कन्या से जो पुत्र यानी लड़का पैदा होगा उसको कन्या का बाप को देना होगा उनके वंश चलाने के लिए ।
मतलब इनको चाहिए तो बस लड़का ही ।
जब-जब हो तब-तब कन्या ही होवें पुत्र न हो तो ग्यारहवें वर्ष तक और जो अप्रिय बोलने वाली हो तो उस स्त्री को छोड़कर दूसरी स्त्री से नियोग करके सन्तानोत्पत्ति कर लेवे ।
विशुद्ध मनु 9/81/ सत्यार्थ प्रकाश चैप्टर 4
वन्ध्या + अष्टमे) वंध्या हो तो आठवें (विवाह से आठ वर्ष तक स्त्री का गर्भ न रहे) (मृतप्रजाः तु दशमे) सन्तान होकर मर जाये तो दशवे (स्त्रीजननी एकादशे अब्दे) जब-जब हो तब-तब कन्या ही होवें पुत्र न हो तो ग्यारहवें वर्ष तक (तु) और (अप्रियवादिनी) जो अप्रिय बोलने वाली हो तो (सद्यः) सद्यः उस स्त्री को छोड़कर (अधिवेद्या) दूसरी स्त्री से नियोग करके सन्तानोत्पत्ति कर लेवे । (स. प्र. चतुर्थ समु.)।
गुदा नंदी एक डायलॉग मारते फिरते हैं की नियोग तो सरोगेसी हैं सिर्फ बच्चा पैदा करने के लिए हैं ।
जो की एक झूठ बात हैं नियोग और सरोगेसी में जमीन और आसमान का फर्क हैं – दिखिए प्रमाण सत्यरथ प्रकाश समुल्लास 4
स्वामी गुदा नंद से कोई सवाल करता है की
प्रश्न)जब एक विवाह होगा एक पुरुष को एक स्त्री और एक स्त्री
को एक पुरुष रहेगा जब स्त्री गर्भवती स्थिररोगिणी अथवा पुरुष दीर्घरोगी हो और
दोनों की युवावस्था हो, रहा न जाय तो फिर क्या करे?
(उत्तर) इस का प्रत्युत्तर नियोग विषय में दे चुके हैं |और गर्भवती स्त्री
से एक वर्ष समागम न करने के समय में दीर्घरोगी पुरुष की स्त्राी से न रहा जाय
तो किसी से नियोग करके उस के लिए पुत्रोत्पत्ति कर दे,
।
मतलब जब स्त्री गर्भवती हो और मर्द से रहा नही जा रहा सेक्स के लिए तो
किसी विधवा से नियोग कर ले ।
औरत भी अगर मर्द बीमार हो और स्त्री से रहा नही जा रही तो किसी
आर्य समाजी नियोगी पंडित से नियोग कर ले ।
स्वामी गुदा नंद साफ़ लिखा है की नियोग बस बच्चे पैदा करने के लिए नहीं शारीरिक संतोषी के लिए भी करना चाहिए ।
|
और नेम की वजह से शादी भी न करे इन लड़कियों से
मनु 3/8
जिस कन्या का ऋक्ष - नक्षत्र पर नाम अर्थात् रेवती रोहिणी इत्यादि, नदी - जिसका गंगा, यमुना इत्यादि पर्वत - जिसका विंध्याचला इत्यादि पक्षी अर्थात् कोकिला, हंसा इत्यादि, अहि अर्थात् उरगा, भोगिनी इत्यादि, प्रेष्य - दासी इत्यादि और जिस कन्या का कालिका, चंडिका इत्यादि नाम हो उससे विवाह न करे ।
(सं० वि० विवाह सं० सत्यरथ प्रकाश 4)
**********
वैदिक ईश्वर का पता लग गया कहा रहता है वो दयानंद का निराकार स्तनों के बीच मे रहता है, सर्वत्र व्याप्त नहीं है 
ऋग्वेद 10/184/1
तू अपनी बहन मां बेटी का योनि का विकास कराते हैं न
वेद मंत्र पढ़ कर ।
पदार्थ -
(विष्णुः)
होमयज्ञ (योनिम्) स्त्रीयोनी को (कल्पयतु) विकसित करे-करता है (त्वष्टा)
सूर्य (रूपाणि) गर्भस्थ बालक के भिन्न-भिन्न अङ्गों को रूप स्वरूप दे
(पिंशतु) पृथक्-पृथक् करे-करता है (प्रजापतिः) माता के अन्दर के
जल-अप्तत्त्व (आ सिञ्चतु) भलीभाँति सींचें-सींचते हैं-बढ़ाते हैं (धाता)
पृथिवी (ते) तेरे (गर्भम्) गर्भ को (दधातु) पुष्ट करे-पाले, पुष्ट करता है,
पालता है ॥१॥
भावार्थ - होम यज्ञ से स्त्रीयोनि का विकास होता है, गर्भधारण करने योग्य बनती है,
****
@ Prashant अब बता
तेरी वेडिक गॉड बता रहा योनि के अन्दर लन्ड से प्रहार करो
यह ज्ञान तू आपने बेटी या बेटा को देता है न
पढ़ कर सुनाता है न
।
की बेटी वेद का ज्ञान ले बेटा वेद ज्ञान ले योनि में लन्ड से प्रहार करना है है ना
तेरी वेडिक गॉड बता रहा योनि के अन्दर लन्ड से प्रहार करो
यह ज्ञान तू आपने बेटी या बेटा को देता है न
पढ़ कर सुनाता है न
।
की बेटी वेद का ज्ञान ले बेटा वेद ज्ञान ले योनि में लन्ड से प्रहार करना है है ना
******
श्री आर्य वेद विज्ञानी गुदा नंद का पुत्र
आज तुम्हे सीखता हु अच्छा मुसलमान कौन है?
और लूट ए महा धन किसे बोलते हैं वो वेद जियान और विजयन से ।
अगर तू नियोग पुत्र होगा तो पोस्ट पे नही आयेगा ,,,
और नियोग पुत्र नहीं है तू आपने ही बाप का हैं तो पोस्ट पे आएगा ।
•वेदों में लूट और सेक्स स्लेव –
इस व्यवस्था को कभी न तोड़े कि लड़ाई में जिस - जिस अमात्य वा अध्यक्ष ने रथ, घोड़े, हाथी, छत्र, धन, धान्य, गाय आदि पशु और स्त्रियां तथा अन्य प्रकार के सब द्रव्य और घी, तेज आदि के कुप्पे जीते हों वही उस - उस का ग्रहण करे ।
(स० प्र० षष्ठ समु०) मनु 7/96
वेद मनुस्मृति अनुसार स्त्री को लूट कर उसे सेक्स स्लेव बनाया जाए ।
जैसे वेद व्यास ने एक दासी से नियोग कर के विदुर को पैदा किया था ।
सत्यारथ प्रकाश समुल्लास ४/ स्वामी दयानंद सरस्वती
।
वेद मनु अनुसार विवाह –
विवाह आठ प्रकार का होता है। एक ब्राह्म, दूसरा दैव, तीसरा आर्ष, चौथा प्राजापत्य, पांचवां आसुर, छठा गान्धर्व, सातवां राक्षस, आठवां पैशाच।
विस्तृतयज्ञ करने में ऋत्विक् कर्म करते हुए जामाता को अलंकारयुक्त कन्या का देना ‘दैव’। वर से कुछ लेके विवाह होना ‘आर्ष’। दोनों का विवाह धर्म की वृद्धि के अर्थ होना ‘प्राजापत्य’ । वर और कन्या को कुछ देके विवाह ‘आसुर’। अनियम, असमय किसी कारण से वर-कन्या का इच्छापूर्वक परस्पर संयोग होना ‘गान्धर्व’। लड़ाई करके बलात्कार अर्थात् छीन, झपट वा कपट से कन्या का ग्रहण करना ‘राक्षस’। शयन वा मद्यादि पी हुई पागल कन्या से बलात्कार संयोग करना ‘पैशाच’।
सत्यारथ प्रकाश समुल्लास 4/ मनुस्मृति 3/21
वैदिक धर्म के लोग इस तरह का विवाह करते है।
इसमें दूसरे अनार्य के औरत , लड़की को जबरदस्ती उठा कर बलात्कार करते हैं ।
स्त्री धन –
(यत् तु अस्याः) और जो इसे (आसुरादिषु
विवाहेषु दत्तं धनं स्यात्) 'आसुर' गन्धर्व, राक्षस,
पैशाच [३.२१] विवाहों में दिया गया धन हो
(अप्रजायाम्+अतीतायाम्) पत्नी के नि:सन्तान मर
जाने पर (तत् माता पित्रोः इष्यते) वह धन स्त्री के
माता-पिता का हो जाता है ॥ विशुद्ध मनुस्मृति ९/१९७॥
।
ब्राह्म, देव, आर्ष, गान्धर्व, प्राजापत्य, असुर , राक्षस विवाहों में जो स्त्री को धन प्राप्त हुआ है वो धन ।
अब देखते हैं असुर और राक्षस विवाह किसे बोलते हैं ?
।
*(लड़ाई करके बलात्कार अर्थात् छीन, झपट वा कपट से कन्या का ग्रहण करना ‘राक्षस’ विवाह कहलाता है। शयन वा मद्यादि पी हुई पागल कन्या से बलात्कार संयोग करना ‘पैशाच विवाह कहलाता है)*
।
कन्या अथवा कन्या की जाति वालों को धन देकर कन्या लेना आसुर विवाह कहलाता है। अर्थात लड़की खरीद लें कर विवाह करना
*हनन, छेदन अर्थात् कन्या के रोकने वालों का विदारण कर क्रोशती, रोती, कंपती और भयभीत हुई कन्या को बलात्कार हरण कर के विवाह करना वह ‘राक्षस विवाह’ ।
*(सं० वि० विवाह सं०)
वेदों में बलात्कार
निरुक्त 12/10, ऋग्वेद 10/17/02 का
यास्क आचार्य एक्सप्लेन करते हैं की
त्वष्टा की कन्या सरण्यू को विवस्वान् आदित्य ने बलात्कार कर के यम यामी को पैदा किया ।,
त्वष्टा की कन्या सरण्यू ने
विवस्वान् के पुत्र आदित्य से यमौ [ यम-यमी ] जोड़े को उत्पन्न किया ।
वह [ सरण्यू ] [ अपने से दूसरी सवर्णा को अपना प्रतिनिधि बना कर
अश्व का रूप बना कर भाग गई । वह विवस्वान् आदित्य अश्व का
ही रूप बना कर उस [ सरण्यू ] के पीछे जा कर उससे संवभूव=
संगत हुआ । तव अश्विनी उत्पन्न हुए। सवर्णा में मनु [ जन्मा | ] उस के
कहने वाली यह ऋक होती है ।। १० ।।
निरुक्त 5/13 उर्वशी को देख कर मित्र और वरुण का वीर्य गिर गया था।
श्रीमद भागवत 6/18/6, 9/13/6
.
ऐसा ही और एक कहानी बृहद्कारण्य उपनिषद में भी आते हैं
जहां वैदिक ईश्वर ने आपने ही बेटी का बलात्कार किया ।
बृहद्कारण्य उपनिषद 1/4/4
.
वैदिक काल में एक ही महिला के साथ अनेक मर्द यौन संबंध बनाते थे और उसे गर्भवती करते थे –
अथर्व वेद 14/2/2
सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 4/ स्वामी दयानंद सरस्वती।
[हे स्त्री ! तू] (सोमस्य) सोम [अर्थात् ऐश्वर्यवान् विवाहितपुरुष] की (जाया) पत्नी (प्रथमम्) पहिली बार [होती है], (गन्धर्वः) गन्धर्व [अर्थात् वेदवाणी का धारण करनेवाला नियुक्त पुरुष] (ते) तेरा (अपरः) दूसरा (पतिः) पति अर्थात् रक्षक [होता है], (अग्निः) अग्नि [अर्थात् ज्ञानी नियुक्तपुरुष] (ते) तेरा (तृतीयः) तीसरा (पतिः) पति [होता है] और (मनुष्यजाः) मनुष्य [मननशीलों में उत्पन्न नियुक्त पुरुष] (ते) तेरा (तुरीयः) चौथा [पति होता है]॥३॥
ऋ० मं० 10 | सू० 85 | मं० 40 ||
हे स्त्रिा!जो (ते) तेरा (प्रथमः) पहला विवाहित (पतिः) पति तुझ को
(विविदे) प्राप्त होता है उस का नाम (सोमः) सुकुमारतादि गुणयुक्त होने से सोम,
जो दूसरा नियोग होने से (विविदे) प्राप्त होता वह (गन्धर्व:) एक स्त्री से संभोग
करने से गन्धर्व, जो (तृतीय उत्तरः) दो के पश्चात् तीसरा पति होता है वह (अग्निः)
अत्युष्णतायुक्त होने से अग्निसंज्ञक और जो (ते) तेरे (तुरीयः) चौथे से लेके ग्यारहवें
तक नियोग से पति होते हैं वे (मनुष्यजाः) मनुष्य नाम से कहाते हैं | जैसा (इमां
त्वमिन्द्र) इस मन्त्रा में ग्यारहवें पुरुष तक स्त्राी नियोग कर सकती है, वैसे पुरुष
भी ग्यारहवीं स्त्री तक नियोग कर सकता है |
।
लूट ए महाधन – वेदों में अनार्य का धन संपत्ति गौ जानवर आदि लूटने का आदेश :–
अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:20» पर्यायः:0» मन्त्र:11 उपलब्ध भाष्य
।
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पदार्थान्वयभाषाः - (शत्रूषाट्) वैरियों को हरानेवाला, (नीषाट्) नित्य जीतनेवाला, (अभिमातिषाहः) अभिमानियों को वश में करनेवाला, (गवेषणः) भूमि वा विद्या का ढूँढ़नेवाला, (सहमानः) शासन करनेवाला, (उद्भित्) बहुत तोड़-फोड़ करनेवाला तू (वाचम्) वाणी को (प्र भरस्व) अच्छे प्रकार भरदे, (इव) जैसे (वाग्वी) उत्तम बोलनेवाला पुरुष (मन्त्रम्) अपने मनन वा उपदेश को। और (संग्रामजित्याय) संग्राम जीतने के लिये (इह) यहाँ पर (इषम्) अन्न का (उत्) अच्छे प्रकार (वद) कथन कर ॥११॥
भावार्थभाषाः - पराक्रमी शूर पुरुष दुन्दुभि की ध्वनि से उत्साहित होकर शत्रुओं को जीतकर अन्न आदि पदार्थ प्राप्त करें ॥११॥
।
अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:20» पर्यायः:0» मन्त्र:10
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
।
पदार्थान्वयभाषाः - (श्रेयःकेतः) कल्याण का ज्ञान देनेवाला, (वसुजित्) धन जीतनेवाला, (सहीयान्) अधिक बलवाला, (संग्रामजित्) संग्रामों का जीतनेवाला, और (ब्रह्मणा) वेद द्वारा (संशितः) तीक्ष्ण किया हुआ (असि) तू है। (अद्रिः) निश्चल स्वभाव, (ग्रावा इव) जैसे सूक्ष्मदर्शी पण्डित (अधिषवणे) तत्त्व मन्थन में (अशूंन्) सूक्ष्म अंशों को [वश में करता है, वैसे ही], (दुन्दुभे) हे दुन्दुभि ! (गव्यन्) भूमि चाहता हुआ तू (वेदः) शत्रु का धन (अधि=अधिकृत्य) वश में करके (नृत्य) नृत्य कर ॥१०॥
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अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:20» पर्यायः:0» मन्त्र:4
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पदार्थान्वयभाषाः - (ऊर्ध्वमायुः) ऊँचा शब्द करता हुआ, (पृतनाः) संग्रामों को (संजयन्) जीतता हुआ, (गृह्याः) ग्रहण करने योग्य सेनाओं को (गृह्णानः) ग्रहण करता हुआ तू (बहुधा) बहुत प्रकार से (वि चक्ष्व) देखता रह।(दुन्दुभे) हे दुन्दुभि ! (दैवीम्) दिव्य गुणवाली (वाचम्) वाणी को (आगुरस्व) उच्चारण कर, (वेधाः) विधान करनेवाला तू (शत्रूणाम्) वैरियों का (वेदः) धन (उप भरस्व) लाकर भर दे ॥४॥
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अथर्ववेद » काण्ड:5» सूक्त:20:3।
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पदार्थान्वयभाषाः - (वृषा इव) बैल के समान (यूथे) अपने झुण्ड में (सहसा) बल से (विदानः) जाना गया, (गव्यन्) भूमि चाहता हुआ (संधनाजित्) यथावत् धन जीतनेवाला तू (अभि) चारों ओर (रुव) गरज। (परेषाम्) वैरियों का (हृदयम्) हृदय (शुचा) शोक से (विध्य) छेद डाल (प्रच्युताः) गिरे हुए (शत्रवः) वैरी (ग्रामान्) अपने गाँवों को (हित्वा) छोड़ कर (यन्तु) चले जावें ॥३॥
।
भावार्थभाषाः - पराक्रमी योधा लोग संग्राम में वैरियों को जीत कर उनका धन और राज्य छीन लें ॥३॥
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( ऋग्वेद 1 : 103 : 6 )
अर्थात : - जिस प्रकार से भले व्यक्ति के धन को चोर - डाकू छीन लेता है उसी प्रकार से इन्द्र ( सेनाध्यक्ष ) धन का आदर करके यज्ञ न करने वालो का धन छीनकर उसे यज्ञ करने वालो के लिए ले जाता है ।
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ऋग्वेद 1 : 40 : 8
अर्थात : - जो राजपुरुष महाधन की प्राप्ति के निमित बड़े और छोटे युद्ध मे जीते व मारे व बांधके निवारण करने और वैदिक धर्म से प्रजा का पालन कराने में समर्थ होते है , वे संसार मे आनंद को भोगकर , परलोक में भी बड़े भारी आनंद को भी भोगते है ।
(महाधन ऋग्वेद भाष्य भूमिका राजाप्रजा धर्म विषय)
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ऋग्वेद 3 : 53 : 14
अर्थात : - हे इन्द्र ( सेनापते ) अनार्य लोगो के जनपदों
में गाय तुम्हारे लिए कुछ भी नही है करेंगी न वे दूध देती है न यज्ञपात्र को अपने दूध से दीप्त कर सकती है , तो तू वे गाय हमारे पास ले आओ और उनका धन भी हमे दो , तुम नीच वंश वाले लोगो का धन हमे प्रदान करो ।
।
अथर्ववेद » काण्ड:6» सूक्त:66» पर्यायः:0» मन्त्र:3
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- (शत्रवः) शत्रु लोग (निर्हस्ताः) निहत्थे (सन्तु) हो जावें, (तेषाम्) उन के (अङ्गा) अङ्गों को (म्लापयामसि) हम शिथिल करते हैं। (अथ) फिर (इन्द्र) हे महाप्रतापी सेनापति इन्द्र ! (तेषाम्) उन के (वेदांसि) सब धनों को (शतशः) सैकड़ों प्रकार से (वि भजामहै) हम बाँट लेवें ॥३॥
भावार्थभाषाः - विजयी वीर पुरुष शत्रुओं को जीत कर सेनापति की आज्ञा अनुसार राजविभाग निकाल कर उनका धन बाँट लेवें ॥३॥
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ऋग्वेद 10/84/02
शत्रुओं पर आक्रमण करके उनको विनष्ट कर उनके धन को छीन ले।
- (मन्यो) हे आत्मप्रभाववाले या स्वाभिमानवाले ! (अग्निः इव-त्विषितः) अग्नि के समान प्रज्वलित तेजस्वी तू है (नः सेनानीः) हमारा सेनानायक हुआ (सहुरे) हे सहनशील ! (हूतः-एधि) आमन्त्रित किया हुआ हमारी ओर हो (सहस्व) शत्रुओं को बाधित कर (शत्रून् हत्वाय) शत्रुओं को मारकर (वेदः-विभजस्व) उनका धन बाँट दे (ओजः-मिमानः) बल का प्रदर्शन करता हुआ (मृधः-विनुदस्व) शत्रुओं को विनष्ट कर ॥२॥
भावार्थभाषाः - आत्मप्रभाववाले य स्वाभिमानी जन को अग्नि के समान तेजस्वी सेनानीरूप में स्वीकार करना चाहिये, जो शत्रुओं पर आक्रमण करके उनको विनष्ट कर उनके धन को छीन ले ॥
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आओ तुम्हे दिखाता हूं वेद का सबसे खतरनाक मंत्र ।
वेदों में इतना क्रूर बातें लिखा है की दुनिया का किसी भी
ग्रंथ में नहीं लिखा है ऐसी बातें ,,,
और पूरी दुनिया वेद ही एक ऐसा ग्रंथ है जिस में हिंसा की बातें भर भर के भरा पड़ा हैं ।
मनुस्मृति 10/45
चार वर्ण का छोड़ कर बाकी जितने भी जाति हैं वो सब हैं दस्यु ,दुष्ट
दुनिया में जितने भी लोग हैं इंसान हैं हिंदुओ का चार वर्ण के लोगो को छोड़ कर वेद मनु अनुसार वो सब इंसान ही नहीं हैं , वो सब दस्यु दुष्ट लोग हैं क्यों के वो लोग नॉन वैदिक हैं , वैदिक धर्म को नही मानता इसलिए वो लोग दस्यु , दुष्ट है। ।
मनुस्मृति 2/11)
जो मनुष्य तर्क शास्त्र के आश्रय से वेद आदि धर्म शास्त्र का अपमान करे ।
तो उसे देश से बाहर निकल दे और वो वेद का निंदा करने से वेद निंदक नास्तिक कहलाता है।
इधर बताया जा रहा है की जो वेदों को नहीं मानता वेदों के ऊपर सवाल करता है तो उसे वेद निंदक नास्तिक बोला जाता है।
आगे आपको वेद निंदक नास्तिक के साथ किया करना चाहिए वो देखने को मिलेगा ।
मनुस्मृति 11/108]
जो वेद में लिखा हैं जो वेद में बताया गया है वोही धर्म हैं
ब्राह्मण , वैश्य, क्षत्रिय अपना भला चाहे तो वेद अनुसार चले ,
विशुद्ध मनुस्मृति।
मतलब जो वेदों में लिखा है जो बताया गया वोही धर्म हैं
और कोई अपना भला चाहे तो वेद अनुसार चले ,
अगर वेद अनुसार न चले उनके साथ क्या किया जाएगा आगे वेद मंत्र में बताया गया हैं –
[ऋग्वेद 10/48/7]
वे जो मुझ इन्द्र (वेदिक ईश्वर)– को-ऐश्वर्यवाले परमात्मा को जो नहीं जानते और मानते, ऐसे नास्तिक-शत्रु-विरोधी मेरी क्यों निन्दा करते हैं, अतः वे दण्डभागी होंगे ॥
जैसे संग्रामस्थल में सैनिक हताहत कर दिये जाते हैं या जैसे खलिहान में अन्नपूलों को चूर-चूर कर दिया जाता है, ऐसे ही इन्द्र उन वर्गों को चूर-चूर देता है। वे निन्दक या नास्तिक इंद्र का कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं।
इस मंत्र के अनुसार कोई वैदिक ईश्वर इंद्र का निंदा नहीं कर सकता उसे मानने से इंकार नहीं कर सकता ,अगर कोई इंकार और निंदा करे तो उसे चूर चूर कर के मारने का आदेश हैं ।
कितना क्रूर हैं वैदिक ईश्वर इस मंत्र से आपको पता चल ही गया होगा ।
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इस ब्रह्मघाती (वैदविरोधी) के लोमों को काट डाल । इस की त्वचा (खाल) को उतार लो । इसके मांस के लोथड़ों को काट डाल । इसकी नसों को ऐंठ दे - कुचल दे । इसकी हड्डियों को मसल डाल । इसकी मज्जा को नष्ट कर डाल । इसके सर्वाअङ्गों व जोड़ों को विश्रथय ढीला कर दे बिल्कुल पृथक् - पृथक् कर डाल । कच्चे मांस को खा - जानेवाला इस ब्रह्मज्य को पृथिवी से धकेल दे और जला डाले ।
अथर्ववेद 12:5:68-73
इस मंत्र में बताया जा रहा है जो वेदों की निंदा करे न माने उन वेद निंदको को आग में जिंदा कर मार डाल, काट डाल , उनके शरीर का बोटी बोटी कर डाल ने का आदेश हैं।
Moblynching जब होता है तब यह यही करता है , मुस्लिमो को मार कर उनके शरीर का बोटी बोटी करते हैं और आग में जिंदा जला कर मार डालते हैं वेद अनुसार ।
अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:93» पर्यायः:0» मन्त्र:1
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पदार्थान्वयभाषाः - (अद्रिवः) हे अन्नवाले ! [वा वज्रवाले परमेश्वर !] (त्वा) तुझको (स्तोमाः) स्तुति करनेवाले लोग (उत्) अच्छे प्रकार (मदन्तु) प्रसन्न करें, तू [हमारे लिये] (राधः) धन (कृणुष्व) कर, (ब्रह्मद्विषः) वेदद्वेषियों को (अव जहि) नष्ट कर दे ॥१॥
इस मंत्र में कहा जा रहा है की वेदिक ईश्वर को स्तुति करने वाले को अच्छे प्रकार प्रसन्न कर और वेद विरोधी को नष्ट कर दे, यानी जो वेद को नहीं मानता जैसे मुस्लिम बुद्ध ईसाई इनको खुल्लम खुल्ला वेद मारने का आदेश दे रहा इस मंत्र में ।
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यजुर्वेद » अध्याय:17» मन्त्र:38
शत्रुओ का गुत्र छिन्न भिन्न करो ।
युद्ध में कभी भी स्त्रियॉं, बच्चों और बूढ़ों की हत्या नहीं करनी चाहिए। लेकिन इसके विपरीत वेद यह शिक्षा देते हैं कि अपने शत्रुओं के गोत्रों और परिवार की बेदर्दी से हत्या करो। उनके भूमि , पैसा धन दौलत आदि लूट लो ।
सुनिए,
गो॒त्र॒भिद॒मिति॑ गोत्र॒ऽभिद॑म्। गो॒विद॒मिति॑ गो॒ऽविद॑म्। वज्र॑बाहु॒मिति॒ वज्र॑ऽबाहुम्। जय॑न्तम्। अज्म॑। प्र॒मृ॒णन्त॒मिति॑ प्रऽमृ॒णन्त॑म्। ओज॑सा। इ॒मम्। स॒जा॒ता॒ इति॑ सऽजाताः। अनु॑। वी॒र॒य॒ध्व॒म्। इन्द्र॑म्। स॒खा॒यः॒। अनु॑। सम्। र॒भ॒ध्व॒म् ॥३८ ॥
यजुर्वेद » अध्याय:17» मन्त्र:38
हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती
पदार्थान्वयभाषाः - हे (सजाताः) एकदेश में उत्पन्न (सखायः) परस्पर सहाय करनेवाले मित्रो ! तुम लोग (ओजसा) अपने शरीर और बुद्धि वा बल वा सेनाजनों से (गोत्रभिदम्) जो कि शत्रुओं के गोत्रों अर्थात् समुदायों को छिन्न-भिन्न करता, उनकी जड़ काटता (गोविदम्) शत्रुओं की भूमि को ले लेता (वज्रबाहुम्) अपनी भुजाओं में शस्त्रों को रखता (प्रमृणन्तम्) अच्छे प्रकार शत्रुओं को मारता (अज्म) जिससे वा जिसमें शत्रुजनों को पटकते हैं, उस संग्राम में (जयन्तम्) वैरियों को जीत लेता और (इमम्) उनको (इन्द्रम्) विदीर्ण करता है, इस सेनापति को (अनु, वीरयध्वम्) प्रोत्साहित करो और (अनु, संरभध्वम्) अच्छे प्रकार युद्ध का आरम्भ करो ॥३८ ॥
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अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:47
अब देखते हैं वेद निंदक नास्तिको के बारे में क्या लिखा है वेद में –
क्षिप्रम् । वै । तस्य । आऽहनने । गृध्रा: । कुर्वते । ऐलबम् ॥१०.१॥
अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:47
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पदार्थान्वयभाषाः - (क्षिप्रम्) शीघ्र (वै) निश्चय करके (तस्य) उस [वेदनिन्दक] के (आहनने) मार डालने पर (गृध्राः) गिद्ध आदि (ऐलबम्) कलकल शब्द (कुर्वते) करते हैं ॥४७॥
भावार्थभाषाः - वेदनिन्दक पुरुष ऐसे बे-ठिकाने संग्राम आदि में मारे जाते हैं कि उनकी लोथों को गिद्ध आदि चींथ-चींथ कर खाते हैं ॥
इस मंत्र में वैदिक ईश्वर आदेश दे रहा है की वेद निंदको को मार कर उनके डेड बॉडी को जंगली जानवरों से खिला दो ,
ज़रा सोचिए कोई व्यक्ति या कोई समुदाय के लोग वेद को न माने तो उनको मार कर जंगली जानवरों से खिला दो । ऐसा आदेश देने वाला वैदिक ईश्वर और वेद कोई ईश्वर का ग्रंथ हो सकता है क्या वेद से शांति हो सकता है।
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ओष॑न्ती स॒मोष॑न्ती॒ ब्रह्म॑णो॒ वज्रः॑ ॥
ओषन्ती । सम्ऽओषन्ती । ब्रह्मण: । वज्र: ॥१०.८॥
अथर्ववेद » काण्ड:12» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:54
पदार्थान्वयभाषाः - (ओषन्ती) जलाती हुई, (समोषन्ती) भस्म कर देती हुई, तू [वेदनिन्दक के लिये] (ब्रह्मणः) ब्रह्म [परमेश्वर] का (वज्रः) वज्ररूप है ॥५४॥
भावार्थभाषाः - वेदानुयायी सत्यवीर पुरुष नास्तिकों का नाश करें ॥
इस मंत्र में बताया जा रहा वेदानुयायी सत्य वीर पुरुष नास्तिक यानी वेद निंदको का नाश करे यानी जिंदा जला कर , या काट कर मार डाले ,
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पदार्थान्वयभाषाः - [हे वेदवाणी !] (त्वया) तुझ करके (प्रमूर्णम्) बाँध लिये गये, (मृदितम्) कुचले गये (दुश्चितम्) अनिष्ट चिन्तक को (अग्निः) आग (दहतु) जला डाले ॥६१॥
मंत्र —32
अथर्ववेद - काण्ड » 11; सूक्त » 9; मन्त्र » 9
सेनापति शत्रुओं को युद्ध में मारकर गिरा दे और चील आदि मांसभक्षक पक्षी उनकी लोथों को नोंच-नोंच कर खावें।
इस मंत्र में बताया जा रहा है वेद अनुसार जो शत्रु हैं उनको मार कर जंगली जानवर पशु पक्षी से उनके डेड बॉडी को खिला दे ।
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अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:9» पर्यायः:0» मन्त्र:10
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(अथो) और भी (सर्वम्) सब (श्वापदम्) कुत्ते के से पैरवाले [सियार आदि हिंसकों का समूह], (मक्षिका) मक्खी और (क्रिमिः) कीड़ा (पौरुषेये) पुरुषों की (कुणपे अधि) लोथों के ऊपर, (अर्बुदे) हे अर्बुदि ! [शूर सेनापति राजन्] (तव) तेरे (रदिते) तोड़ने-फोड़ने पर (तृप्यतु) तृप्त होवें ॥१०॥
भावार्थभाषाः - शूर सेनापति के विध्वंस करने पर शत्रुओं की लोथों से हिंसक पशु-पक्षी पेट भरें ॥१०॥
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अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:8
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(वयांसि) वे गतिवाले [प्राणी] (अव अयन्ताम्) उतरें, (ये) जो (पक्षिणः) पंखवाले हैं और (ये) जो (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष के भीतर (दिवि) प्रकाश में (चरन्ति) चलते हैं। (श्वापदः) कुत्ते के से पैरवाले [सियार आदि], (मक्षिकाः) मक्खियाँ (सं रभन्ताम्) चढ़ें, (आमादः) मांसाहारी (गृध्राः) गिद्ध (कुणपे) लोथ पर (रदन्ताम्) नोंचें खरोचें ॥८॥
भावार्थभाषाः - शत्रुओ को जीतने के बाद शत्रुओं की लोथों को मांसाहारी पशु-पक्षी खैंच-खैंच कर खावें ॥८॥
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अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:23
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- (ये) जो (अमित्राः) शत्रु लोग (वर्मिणः) वर्म [कवच विशेष] वाले हैं, (ये) जो (अवर्माणः) विना कर्मवाले हैं, (च) और (ये) जो (वर्मिणः) झिलमवाले हैं। (अर्बुदे) हे अर्बुदि [शूर सेनापति] (तान् सर्वान्) उन सब (हतान्) मारे गयों को (श्वानः) कुत्ते (भूम्याम्) रणभूमि पर (अदन्तु) खावें ॥२३॥
भावार्थभाषाः - शूर सेनापति से मारे गये सब शत्रुओं की लोथों को कुत्ते आदि खावें ॥२३॥
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अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:24
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(ये) जो [शत्रु] (रथिनः) रथवाले हैं, (ये) जो (अरथाः) विना रथवाले हैं, (ये) जो (असादाः) विना वाहनवाले [पैदल] हैं, (च) और जो (सादिनः) वाहनवाले [घुड़चढ़े, हाथी आदि पर चढ़े हुए] हैं। (तान् सर्वान्) उन सब (हतान्) मारे गयों को (गृध्राः) गिद्ध (श्येनाः) श्येन [वाज आदि] (पतत्रिणः) पक्षीगण (अदन्तु) खावें ॥२४॥
भावार्थभाषाः - रणक्षेत्र में मर कर पड़े हुए शत्रु के सेनादलों को मांसाहारी पक्षी खावें ॥२४॥
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आर्य समाज़ी हिंदू तो कहते है हमारा वेद कहता है मनुर्व भावः मनुष्य बनों,
👇ये वाला वेद मनुष्य को कहता है बेल बनो,का लोचा बा?वेद में का बा वेद में भेद बा 😊
अथर्व वेद 6/101/01
पंडित विश्व नाथ विद्यालंकार आर्य समाज
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हे पुरुष ! (श्वसिहि) तू प्राणशक्तिसम्पन्न बन, (आवृषायस्व) और शक्तिशाली वृषभ के सदृश शक्तिशाली बन, (वर्धस्व) शरीर से बढ़, (प्रथयस्व) और परिवार को बढ़ा। (यथाङ्गम्) अन्य अङ्गों के सदृश (शेपः) तेरी प्रजनन इन्द्रिय (वर्धताम्) बढ़े, (तेन) उस बढ़ी इन्द्रिय के साथ (योषितम्) प्रीति करनेवाली पत्नी को (इत्) ही (नहीं) जाया कर।
।
पंडित सत्य प्रकाश सरस्वती आर्य समाज
Behave like a strong bull. Breathe in vitality. Grow and spread, So that your male organ be developed to the full. With that go to the woman confidently.
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👇ये वाला वेद मनुष्य को कहता है बेल बनो,का लोचा बा?वेद में का बा वेद में भेद बा 😊
अथर्व वेद 6/101/01
पंडित विश्व नाथ विद्यालंकार आर्य समाज
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हे पुरुष ! (श्वसिहि) तू प्राणशक्तिसम्पन्न बन, (आवृषायस्व) और शक्तिशाली वृषभ के सदृश शक्तिशाली बन, (वर्धस्व) शरीर से बढ़, (प्रथयस्व) और परिवार को बढ़ा। (यथाङ्गम्) अन्य अङ्गों के सदृश (शेपः) तेरी प्रजनन इन्द्रिय (वर्धताम्) बढ़े, (तेन) उस बढ़ी इन्द्रिय के साथ (योषितम्) प्रीति करनेवाली पत्नी को (इत्) ही (नहीं) जाया कर।
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पंडित सत्य प्रकाश सरस्वती आर्य समाज
Behave like a strong bull. Breathe in vitality. Grow and spread, So that your male organ be developed to the full. With that go to the woman confidently.
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