भूमिका:- आज मैं आपके सामने सत्यार्थप्रकाश के प्रथम संस्करण (1875 ई०) अर्थात First Edition/Version से चन्द प्रमाण रखूंगा जहां स्वामी दयानंद ने मांस भक्षण तथा बलि प्रथा का ज़िक्र किया है और उसे न के सिर्फ़ धर्म माना है, बल्कि वेदानुकूल भी माना है, जैसा कि मनुस्मृति में भी हमें देखने को मिलता है, लेकिन बाद के संस्करण से इसे हटा दिया गया।।
अब ये समाजियों की ज़िम्मेदारी है कि वो हमें बताये आकर की इसे बाद के संस्करण से क्यों निकाल बाहर किया गया।।
#नोट प्रमाण हम संक्षेप में रखेंगें, जिसको पूरी पढ़नी है वो तश्वीर के माध्यम से पूरी पढ़ सकते है।।
1.. प्रथम संस्करण, सत्यार्थप्रकाश का तीसरा समुल्लास इसका पृष्ठ शंख्या 53 में स्वामी जी फ़रमाते है, "वेद ब्राह्मण और सूत्र पुस्तकों में चार प्रकार के पदार्थ होम के लिखे है एक तो वह है जिसमे सुगन्ध गुण हो जैसे कस्तूरी केशर आदि दूसरा वह है जिसमे मिष्ट (मीठा) गुण हो जैसे मिश्री शक्कर आदि तीसरा वह है पुष्टिकारक (सेहतमंद) गुण हो जैसे दूध, घी, मांस आदि और चौथा जिसमे रोग निवृत्तिकारक (बीमारी से मुक्त) गुण हो जैसा कि वैद्यकशास्त्र (आयुर्वेद) की रीति से सोमलतादिक औषधियां लिखी है, उन चारों का यथावत् शोधन उनका परस्पर संयोग और संस्कार कर के होम करें।"
●होम:- उसे कहते है, जिस में वेद का मंत्र पढ़ते हुए अग्नि (यज्ञ) में भेंट दिया जाता है।
2.. प्रथम संस्करण, सत्यार्थप्रकाश का चौथा समुल्लास इसका पृष्ठ शंख्या 176 में स्वामी जी फ़रमाते है, "अजामेधका (बकरे/भेड़ आदि की बलि) अश्वमेध (घोड़े की बलि) गोमेधका (बांज गाय या बैल/सांड की बलि) करने से तो संसार का उपकार होता है और मांस का टुकड़ा पिण्ड (यज्ञ में देने से) कोई पाप नहीं। आगे फ़रमाते है, "जो पदार्थ आप खाते है उसी से पञ्चमहायज्ञ करें।"
●पञ्चमहायज्ञ= *ब्रह्मयज्ञ, *पितृयज्ञ, *देवयज्ञ, *भूतयज्ञ, *नृयज्ञ
3..प्रथम संस्करण, सत्यार्थप्रकाश का पांचवा समुल्लास इसका पृष्ठ शंख्या 209-210 में स्वामी जी फ़रमाते है, "बिना आज्ञा से पर-पदार्थ का ग्रहण करना अर्थात चोरी कर अपनी इंद्रियों की पुष्ट के वास्ते मांस का खाना और पशुओं को मारना यह राक्षस विधान है, लेकिन यज्ञ के वास्ते जो पशु की हिंसा होती है वो विधिपूर्वक है अर्थात वेद के अनुसार है।।"
4.. प्रथम संस्करण, सत्यार्थप्रकाश का दसवा समुल्लास इसका पृष्ठ शंख्या 387-388-389-390 में स्वामी जी फ़रमाते है, "भक्ष्याभक्ष्य दो प्रकार के होते है, एक तो वैद्यकशास्त्र (आयुर्वेदिक) की रीति से दूसरा धर्मशास्त्र की रीति से। वैद्यक शास्त्र की रीति से भक्षण करने के अर्थ को समझाते हुए स्वामी जी फ़रमाते है यानी जो देश, काल, वस्तु और अपने शरीर का प्रकृति उनसे अनुकूल विचार कर के भक्षण करना चाहिए अन्यथा नहीं, अर्थात् जो चीज़े आपके शरीर के लिए उचित है वही चीज़ खाये, अतः नहीं खाये। मसलन अगर आपके शरीर मे कोई रोग हो और वो खाने से आपका रोग बड़ा सकता है तो उसको न् खाये और जो खाना आपके शरीर को सेहतमंद बना सकता है किसी बीमारी से आपको शिफ़ा दे सकता है तो उसे खाये।। आगे धर्मशास्त्र रीति से भक्षण के ऊपर फ़रमाते है कि मनुष्य के लिए जितने फायदे वास्ते पशु है उनका मांस खाना अभक्ष्य है (आसान भाषा मे नाजायज़ है)। और बिना होम (वेद मन्त्र के) अन्न और मांस भी अभक्ष्य है।।"
(पूरी बहस मौजूद है 388 से लेकर 390 तक तफ़सील से जानने के लिए हार्ड कॉपी पढ़े)।
5वा अंक पढ़ने के बाद आपको ये एहसास हो जाएगा कि सत्यार्थप्रकाश से इन बातों को क्योंकर निकाल दिया गया।
5..प्रथम संस्करण, सत्यार्थप्रकाश पांचवा समुल्लास पृष्ठ शंख्या 178 में स्वामी जी फ़रमाते है, "गाय तो पशु है, सो पशु की क्या पूजा करना उचित है, कभी नहीं किन्तु उसकी तो यही पूजा है कि घास, जल इत्यादि चीज़ों से उसकी रक्षा होती है, वो भी दूध, घी, दही, इत्यादि चीज़ों की वजह से अन्यथा नहीं, अर्थात अगर गाय हमे ये सब प्रदान नहीं करती तो हम उसे घास-जल इत्यादि चीज़ भी नहीं ख़िलाते, क्योंकि वो हमें ये सब पौषिटक चीज़े देती है इसलिए हम उसको घास-फूस खिला देता है, और यही खिला देना उसके लिए पूजा है। और गधी की भी पूजा वैसे ही होती क्योंकि वो हमारे बोझ उठाती है, जिसका जैसा मक़सद होता है, वो अपना मतलब निकालने के लिए करता है।।"
धन्यवाद...
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