Tuesday, 9 August 2022

महामृत्युंज।

मित्रों आज हम बात करते हैं एक खास मंत्र की,
कहा जाता है कि इस मंत्र के रचयिता का नाम मृत्युंजय है जिन्होंने इस मंत्र की शक्ति से मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी, 

ये शिव उपासना का मंत्र है जो कि वेदों में दो जगह वर्णित है पहला वर्णन मिलता है ॠग्वेद के सप्तम मंडल में 59 वें सूक्त के १२ वें श्लोक में जिसे आप सभी विद्वान प्रचारित करते हैं और दूसरा वर्णन मिलता है यजुर्वेद के अध्याय तीन में ६० वें श्लोक के रूप में अंकित है जो कि पूरा श्लोक है, जिसे आप लोग प्रचारित नहीं करते हैं क्यों ?

जब आप यजुर्वेद के गायत्री मंत्र को प्रचारित कर सकते हैं तो यजुर्वेद के मृत्युंजय मंत्र से भेदभाव क्यों ?

कितने आश्चर्य की बात है कि आज तक इस मंत्र का हमेशा आधा ही भाग प्रचारित किया गया, इसकी दूसरी लाइन का कहीं भी कोई जिक्र ही नहीं होता है, ना  कोई विद्वान इस मंत्र का सही अर्थ बताता है,

अरे भाई अगर आप आधा मंत्र बता रहे हो तो उसका अर्थ तो सही बताओ वो भी गलत बता रहे हो क्यों ?
माना हमारे देश वासियों का हाथ संस्कृत में अँग्रेज़ी से भी ज्यादा तंग है तो क्या कुछ भी समझा दोगे ?

सोचो! कभी मेरे जैसा व्यक्ति नहा धोकर आपके फैलाए गए पाखंड के पीछे पड़ जाएगा तब क्या करोगे ?
लीजिए हम ही बता देते हैं सच क्या है ?

यजुर्वेद के अनुसार इस मंत्र की पहली लाइन पुरुष के लिए है उसे इसका नियमित जाप करना चाहिए, पहली लाइन का संपूर्ण हिन्दी अर्थ मैं नीचे दे रही हूँ पढ़ें और समझें!

“त्रयंबकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनं
उर्वारुकमिव बंधनान मृत्योर्मोक्षिय मामृतात।“
ये तो मंत्र की पहली लाइन है जो कि ॠग्वेद में भी वर्णित है चलो इसका हिन्दी अर्थ निकालते हैं!
त्रयंबकं (तीन नेत्रों अथवा तीन दृष्टि वाले महादेव का)
यजामहे (हम यजन करते हैं जो)
सुगंधिं (सुगंधयुक्त व)
पुष्टिवर्धनं (ताकत को बढ़ाने वाले हैं वे)
उर्वारुकमिव (ककड़ी के फल के समान)
बंधनान (बंधन से)
मृत्योर्मोक्षिय (मृत्यु से मुक्त)
मा अमृतात: (अमृत से विमुख ना हो)

भावार्थ:- तीन नेत्रों वाले महादेव का हम यजन करते हैं वे हमारे ककड़ी के फल को सुगंधयुक्त व पुष्टि (ताकत) प्रदान करें, हम इसके अमृत रूपी आनंद से कभी विमुख ना हो, हम मृत्यु के बंधन से मुक्त रहें।

अब हम रुख करते हैं मंत्र की दूसरी लाइन की तरफ जो कि स्त्रियों के लिए है, ये सिर्फ यजुर्वेद में वर्णित है पहली लाइन और दूसरी लाइन को मिलाकर यजुर्वेद में इसे एक ही मंत्र कहा गया है,

“ त्रयंबकं यजामहे सुगंधिं पतिवेदनं,
उर्वारुकमिव बंधनाढ़ितो मुक्षीय मामुर्त: !!
चलिए इसके भी शब्दों का हिन्दी अर्थ निकालते हैं,
त्रयंबकं (तीन नेत्रों अथवा तीन दृष्टि वाले महादेव का)
यजामहे (हम यजन करते हैं जो)
सुगंधिं (सुगंधयुक्त)
पतिवेदनं (पति को देने वाले)
उर्वारुकमिव (ककड़ी के फल)
बंधनाढ़ितो (बंधन से बांधे रहें)
मुक्षीय (मुक्त)
मामुर्त: / मा अमृत: (अमृत से वियुक्त ना हों)

भावार्थ:- तीन नेत्रों वाले महादेव का हम यजन करते हैं वे हमें सुगंधयुक्त पति को देने वाले बंधन से मुक्त ना करें और हम उनकी ककड़ी के फल के अमृत से वियुक्त ना हों।

तो मित्रों ये है महा मृत्युंजय मंत्र का सच, कैसे इसके अर्थ का अनर्थ करके समाज को बताया जाता है, अब आप बताएँ ये यौन शक्ति वर्धक मंत्र है या आपके प्राण बचाने वाला महा मृत्युंजय मंत्र ?

इस मंत्र के साथ जुड़ी सभी कथाएँ भी इसके प्रचारित अर्थ की तरह झूठी ही होंगी, उपरोक्त मंत्र के शब्दों का अर्थ आप स्वयं अटैच फोटो से मिलान कर लें जिसे मैंने यजुर्वेद सुबोध भाष्य से कर सकते हैं!

मैंने तो सिर्फ शब्दों को व्यवस्थित किया है दोनों लाइनों में स्त्री और पुरुष की स्तुति स्वयं अपनी सत्यता कहती है वैसे भी शिवलिंग की पूजा का महत्व स्त्री और पुरुषों के लिए यही तो है ?

अब तक आपने लिया धर्म ज्ञान अब लो धर्ममुक्त ज्ञान,
तो मित्रों इस लेख से हमें पता चलता है कि हम हिन्दू धर्म के मायाजाल में किस तरह जकड़े हुए हैं, 

इनका सबसे ताकतवर मंत्र भी लिंग और योनि की जरूरतों पर ही आधारित है इसीलिए हिन्दू धर्म में लिंग और योनि की पूजा होती है इसका सीधा अर्थ यही हुआ कि असली ईश्वर लिंग और योनि हैं जो सृष्टि को सृजित करते हैं,

आई बात समझ में  ?
तो आगे से जब भी पूजा करने का मन करे तो अपने जीवन साथी को प्रेम कर लेना, उन्हें स्वयं के समान दर्जा देना, आपको किसी भी मंदिर, जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, घर में ही आपको स्वर्ग और शांति दोनों मिल जाएंगी,

धार्मिक अंधविश्वास और पाखंड से बाहर निकलो, वास्तविक बनो,
धर्ममुक्त बनो, आधुनिक रहो,

जय धर्ममुक्त

No comments:

Post a Comment

टाइगर, Sher,

  संवृतस्मृति अनुसार ज़ब सना टुन्नी लड़कीयों के योनि मे फस्ट टाइम बाल आता है तो मून देवता सेक्स करके चले जाते है ज़ब फस्ट टाइम मेंस आता है तो ...