Thursday, 11 August 2022

ऋग्वेद। अथर्व।

ऋग्वेद 10:71:1 
बृह॑स्पते प्रथ॒मं वा॒चो अग्रं॒ यत्प्रैर॑त नाम॒धेयं॒ दधा॑नाः । यदे॑षां॒ श्रेष्ठं॒ यद॑रि॒प्रमासी॑त्प्रे॒णा तदे॑षां॒ निहि॑तं॒ गुहा॒विः ॥

का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है_

बृहस्पति ने सबसे पहले भगवान के वचन बोले, जिन्होंने उन्हें प्रैरात का नाम दिया। उनमें से जो सबसे अच्छा था, जो कुछ भी उनके दुश्मन का जीवन था, वह गुफा में छिपा हुआ था।

भाष्यकारो ने अर्थ का अनर्थ कर दिया है
वेद मे जियान विज्यान खोजने के चक्कर में।

Kaling Yodha आर्या प्रीति क्षत्राणी शिवालिका राजपूत Alok Kujur Panchvedi

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विषय - गर्भाधान का उपदेश।

शमीम् । अश्वत्थ: । आऽरूढ: । तत्र । पुम्ऽसुवनम् । कृतम् । तत् । वै । पुत्रस्य । वेदनम् । तत् । स्त्रीषु । आ । भरामसि ॥११.१॥

 अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 11; मन्त्र » 1
 
अथर्ववेद भाष्य (पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी) - हिन्दी - Pandit Kshemkarandas Trivedi

पदार्थ -
(अश्वत्थः) बलवानों में ठहरनेवाला पुरुष (शमीम्) शान्तस्वभाव स्त्री के प्रति (आरूढः) आरूढ हो चुकता है, (तत्र) उस काल में (पुंसुवनम्) सन्तान का उत्पत्तिकर्म (कृतम्) किया जाता है। (तत्) वह कर्म (वै) हा (पुत्रस्य) कुलशोधक संतान की (वेदनम्) प्राप्ति का कारण है, (तत्) उस कर्म को (स्त्रीषु) स्त्रियों में (आभरामसि) हम पहुँचाते हैं ॥१॥

भावार्थ - वीर्यवान् पति और शान्तस्वभाव पत्नी यथाविधि परस्पर संयोग करके सन्तान उत्पन्न करें ॥१॥ इस सूक्त का विधान पुंसवनसंस्कार में भी दयानन्दकृत संस्कारविधि में है ॥

वेदों के अनुसार 
पति और पत्नी के संयोग से पत्नी प्रेगनेंट होती है।
लेकिन 
वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 16 में
राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या खीर खाने से प्रेगनेंट हो गई
ऐसे कैसे??????


कृष्ण मृत्यु।

कृष्ण और भीष्म में श्रेष्ठ कौन ?

महाभारत मौसल पर्व के अध्याय चार में कृष्ण को एक तीर लगने से मौत हो गया।

महाभारत भीष्म पर्व में भीष्म को अनेक तीर लगने के पश्चात भी कुछ दिन तक जीवित रहे ?

वेद विज्ञान।


प्रस्तुत है
वेद का जियान विजयान अर्थ का अनर्थ

अवर्त्या। शुनः। आन्त्राणि। पेचे। न। देवेषु। विविदे। मर्डितारम्। अपश्यम्। जायाम्। अमहीयमानाम्। अध। मे। श्येनः। मधु। आ। जभार ॥१३॥

 ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 18; मन्त्र » 13
 
#ऋग्वेद भाष्य (स्वामी दयानन्द सरस्वती के संस्कृत भाष्य के आधार पर) - हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती
विषय - फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थ -
हे राजन् ! जो (मे) मेरी (अमहीयमानाम्) नहीं सत्कार की गई (जायाम्) स्त्री को (श्येनः) वाज पक्षी के सदृश शीघ्र चलनेवाला सब ओर से (आ, जभार) हरता है (अधा) इसके अनन्तर (शुनः) कुत्ते की (अवर्त्या) नहीं वर्त्तने योग्य (आन्त्राणि) और उठे हैं हाड़ जिनसे उन स्थूल नाड़ियों के सदृश शरीर को (पेचे) पचाता है, इससे (मर्डितारम्) सुख करनेवाले आपका मैं (अपश्यम्) दर्शन करूँ। वह जैसे (देवेषु) विद्वानों में (मधु) मधुर विज्ञान को (न) नहीं (विविदे) प्राप्त होता है, वैसे उसको निरन्तर दण्ड दीजिये ॥१३॥

★ पदार्थ में दयानंद चाचा ने से राजन् ! का अर्थ #मंत्र में किस शब्द से किया है?
★ नाड़ियां को पचाने वाला का दर्शन क्यों करना है ?
★ कर्म के अनुसार सबको दंड मिलता है तो इस मंत्र के अनुसार दंड देने का आज्ञा दिया जा रहा है ??

नोट- दो भाष्य कारों का भाष्य पेश किया है
★ दोनों भाष्यकारों के भाष्य में कितना अंतर है ?
★ दोनों लोगों का भाष्य एक दुसरे के #विरोधाभास क्यों ?

★ #कुत्ते का #मांस #खाने का तात्पर्य क्या है?
★ हम अपने #पत्नी को #अपमानित होते #देखते रहे 
आखिर #क्यों ????


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वेद का जियान विजयान प्रस्तुत 👇

यत्र । समुद्रः । स्कभितः । वि । औनत् । अपाम् । नपात् । सविता । तस्य । वेद । अतः । भूः । अतः । आः । उत्थितम् । रजः । अतः । द्यावापृथिवी इति । अप्रथेताम् ॥ 
 ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 149; मन्त्र » 2
 
ऋग्वेद भाष्य (ब्रह्ममुनि जी) - हिन्दी - स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक
पदार्थ -
(यत्र) जिसमें जिसके आश्रय में (समुद्रः) समुन्दनशील आकाशस्थ सूक्ष्म जलाशय (स्कभितः) वायु के द्वारा सम्भाला हुआ-ठहरा हुआ (वि-औनत्) भूमि को विशेषरूप से गीला करता है (अपां नपात्) जलों को न गिरानेवाला (सविता तस्य वेद) परमात्मा उसको जानता है (अतः-भूः) इससे जो उत्पन्न होती है विकृति महत्तत्त्वादि पञ्चतन्मात्र पर्यन्त सत्ता (अतः-रजः उत्थितम्-आः) यहीं से अन्तरिक्षलोक उत्पन्न हुआ है (अतः) यहीं से (द्यावापृथिवी) द्युलोक और पृथिवीलोक (अप्रथेताम्) प्रथित हुए #फैले ॥२॥

भावार्थ - परमात्मा के आश्रय आकाश का जलाशय वायु के द्वारा सम्भला हुआ है, वही भूमि पर बरसता है, वह कैसे बनता और कैसे स्थिर रहता है, उसको वायु नहीं जानता, किन्तु परमात्मा जानता है, उस परमात्मा से महत्तत्त्व से लेकर पञ्च तन्मात्राओं तक सूक्ष्म सृष्टि उत्पन्न होती है, वहीं से अन्तरिक्षलोक भी उत्पन्न होता है, और द्युलोक पृथ्वीलोक भी उसी के द्वारा #फैलाये हुए हैं ॥२॥

समीक्षा - फैला वह होता है जो चपटा होता है
गेंद को कोई फैला या चपटा नहीं कह सकता क्योंकि गेंद गोल होता है
लेकिन आप चादर को फैला या चपटी कहते हैं
क्योंकि चादर गोल नहीं हो सकता है बल्कि फैला होता है अर्थात चपटी।

यह वेद मंत्र स्पष्ट करता है
कि पृथ्वी चपटी है

जबकि विज्ञान के अनुसार
पृथ्वी गोल है।

इसके यह स्पष्ट होता है
वेद गपोड़ गाथा है
जिसमें वैदिक ईश्वर को यह नहीं पता
पृथ्वी गोल है या चपटी?

★ वैदिक ईश्वर ने पृथ्वी को चपटी बनाया है तो विज्ञान के अनुसार पृथ्वी गोल क्यों है???

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भागवत।


🔼पाखंड शिरोमणि श्रीमद्धभागवत महापुराण🔽

श्रीमद्भागवत पुराण समस्त पुराणों का मुकुटमणि है। ऐसा माना जाता रहा है, भागवत में कहा गया है-

सर्ववेदान्तसारं हि श्रीभागवतमिष्यते।
तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रतिः क्वचित् ॥
श्रीमद्भाग्वतम् सर्व वेदान्त का सार है। उस रसामृत के पान से जो तृप्त हो गया है, उसे किसी अन्य जगह पर कोई रति नहीं हो सकती। (अर्थात उसे किसी अन्य वस्तु में आनन्द नहीं आ सकता) क्यों कि इस में है ही कुछ ऐसा।

अष्टादश पुराणों में भागवत नितांत महत्वपूर्ण तथा प्रख्यात पुराण है। पुराणों की गणना में भागवत अष्टम पुराण के रूप में परिगृहीत किया जाता है (भागवत 12.7.23)

इस पुराण में बारह स्कन्ध हैं, जिनमें विष्णु के अवतारों का ही वर्णन है। नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना पर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूत जी ने इस पुराण के माध्यम से श्रीकृष्ण के चौबीस अवतारों की कथा कही है।

इस पुराण में वर्णाश्रम-धर्म-व्यवस्था को पूरी मान्यता दी गई है तथा स्त्री, शूद्र और पतित व्यक्ति जो वेद सुनने के अधिकारी नहीं है वह वंचित भागवत सुन कर अपना  उद्धार करें।

श्रीमद्भागवत पुराण’ में बार-बार श्रीकृष्ण के ईश्वरीय और अलौकिक रूप का ही वर्णन किया गया है। पुराणों के लक्षणों में प्राय: पाँच विषयों का उल्लेख किया गया है, किन्तु इसमें दस विषयों-सर्ग-विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय का वर्णन प्राप्त होता है । इसमें श्रीकृष्ण के गुणों का बखान करते हुए कहा गया है कि उनके भक्तों की शरण लेने से किरात् हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन और खस आदि तत्कालीन जातियाँ भी पवित्र हो जाती हैं।

लेकिन यदि कोई इस पुराण को निष्पक्ष भाव से पढे तो लगेगा कि यह किसी महाधूर्त महामूर्ख लम्पट प्रमादी खल कामी द्वारा लिखा गया है ।
हम ही नहीं बल्कि अत्रि स्मृतिकार ने तो इसके संबंध में यहाँ तक लिख दिया है 👇

वैदर्विहिनाश्च पठन्ति शास्त्रं । शास्त्रेण हीनाश्च पुराण पाठाः।। 
पुराणहीनाः कृषिणो भवन्ति। भ्रष्टस्ततो भागवत भवन्ति।।                           (अत्रिस्मृति/381)

अर्थात वेदों से जो भ्रष्ट है वे उनसे नीचे के ग्रंथ शास्त्रो को पढतें है। जो शास्त्रों से हीन हैं वे उनसे भी निम्न कोटि के ग्रंथ पुराणों को पढतें है, जो पुराणों से भी हीन है वे  खेती का कार्य करते हैं ।तथा जो लोग इन सबसे भ्रष्ट वे लोग सबसे नीच ग्रंथ भागवत को पढतें फिरते है।

सही ही तो कहा है स्मृतिकार ने इसमें दो राय नहीं कि भागवत जैसा फूहड़ बकबास बेतुकी बेमतलबी अनुपयोगी बातों से भरा ग्रंथ कोई नहीं , हम कह सकते हैं कि यह समस्त फूहड़ ग्रंथो का मुकुट शिरोमणि ग्रंथ है। हम यह बात हवा में नहीं लिख रहे हैं बल्कि तथ्यों के आधार पर ही यह लिखने की हिम्मत कर पाए है आप परेशान न हो हम इसका प्रमाण भी देगें कि यह धूर्त मक्कार पाखंडियों द्वारा ही लिखा गया है अब देखिये -:

◾यज्ञ में पशु बलि -:
निवारयामासुरहो महामते न युज्यतेऽत्रान्यवधः प्रचोदितात्।।                                (04/19/27)
                
यज्ञदीक्षा ले लेने पर शास्त्रविहित यज्ञ पशु को छोड कर और किसी का वध करना उचित नहीं।। 

◾मत्स्य भगवान के शरीर का विस्तार चार लाख (400000) कोस था ।                  (09/24/44)🙃
📝 -- एक कोस में तीन किलोमीटर (400000 का गुणा 3 से करने पर 1200000 वर्ग किलोमीटर 
मतलब भारत के  3,287,000 km² से आधे से कुछ कम।

◾ब्रह्मा को अपनी पुत्री सरस्वती पर मोहित होने पर उन्हीं ब्रह्मा के पुत्रो द्वारा खरी खोटी सुनाना -:

नैतत्पूवैंः कृतंत्त्वद्य न करिष्यन्ति चापरे।
 यत्त्वं दुहितरं गच्छेरनिगृह्यागड्गजं प्रभु।। 
                                    (30/12/03) पृष्ठ - 252
मरीचि आदि बोले - पिताजी!  आप समर्थ है फिर भी अपने मन में उत्पन्न हुये कामवेग को न रोक कर पुत्री गमन जैसा दुस्तर पाप करने का संकल्प कर रहे हैं। ऐसा तो आपसे पूर्ववर्ती किसी ब्रह्मा ने नहीं किया और न आगे ही कोई करेगा। 🤧

◾ भगवान शिव शंकर की अरबो खरबो सेविकाए -:
भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्त्रैरवरूध्यमानो। 
भव उपधावति ।🤑
                                   (19/17/05) पृष्ठ - 614

◾छीक से मनुष्य पैदा होना -:
क्षुवतस्तु मनोर्जज्ञे इक्ष्वाकुर्घ्राणतः सुतः  😌
                               (04/06/09) खंड -2 , पृष्ठ -24
◾श्राद्ध में पवित्र पशुओं का मांस प्रयोग। 
                                                       (06/06/09)
◾वरूण के लिए हरिश्चन्द्र का नरमेध यज्ञ के लिए अपने पुत्र रोहित को यज्ञ पशु बनाने का वरूण देव को वचन।                                    (10-11-12/07/09)

◾कुब्जा और श्री कृष्ण की मनोहर सेज पर संभोग क्रीडा। पढे श्रीमद्धभागवत महापुराण स्कंद -10 अध्याय  - 48 श्लोक - 01 से लेकर 11 तक😘😍

◾यदुवंश के बालको को पढाने के लिए तीस करोड़ अठ्ठासी लाख आचार्य (308800000)😱😯

◾श्री कृष्ण के नाना उग्रसेन के एक नील (10000000000000) सैनिक । (42/90/10)😶

◾श्री कृष्ण द्वारा अन्य यदुवंश शिरोमणियों के साथ यज्ञ के लिए मेध्य पवित्र पशुओं को मार कर लाना -:
👇

चरन्तं मृगयां कापि हयमारूह्य सैन्धवम्। 
घ्रन्तं ततः पशून् मेध्यान् परीतं यदुपुड्गवै।। 
                                   (35/69/10) ! पृष्ठ - 577
नारद ने देखा कि - श्री कृष्ण श्रेष्ठ यादवों से घिरे हुये सिन्धूदेशीय घोड़े पर चढ़कर मृगया कर रहे हैं और उसमे यज्ञ के लिए मेध्य पशुओं का ही वध कर रहे हैं। 
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आप ने पढा , समझा इसके लिए में आभारी हूं !
अब हम यह देखते हैं कि क्या यह भागवत पुराण वेदव्यास ने लिखा और क्या राजा परीक्षित ने शुकदेव से सुना था!?

तो अब इसके लिए हमें महाभारत सहिंता को पलटना पड़ेगा 
 महाभारत  में आदिपर्व  के अन्तर्गत आने वाले आस्तीकपर्व  (अध्याय - 40 से 43) में राजा परीक्षित उपाख्यान है जिसमें उनकी कथा कुछ इस प्रकार दी है 
👇
एक बार राजा परीक्षित आखेट हेतु वन में गये। वन्य पशुओं के पीछे दौड़ने के कारण वे प्यास से व्याकुल हो गये तथा जलाशय की खोज में इधर उधर घूमते घूमते वे शमीक ऋषि के आश्रम में पहुँच गये। वहाँ पर शमीक शान्तभाव मौन व्रत धारण किये हुये  एकासन पर बैठे हुये थे। राजा परीक्षित ने उनसे जल माँगा किन्तु शमीक ऋषि ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया, राजा परीक्षित को प्रतीत हुआ कि यह ऋषि ध्यानस्थ होने का ढोंग कर के मेरा अपमान कर रहा है। उन्हें ऋषि पर बहुत क्रोध आया। उन्होंने अपने अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से पास ही पड़े हुये एक मृत सर्प को अपने धनुष की नोंक से उठा कर ऋषि के गले में डाल दिया और अपने नगर वापस आ गये।

डारि नाग ऋषि कंठ में, नृप ने कीन्हों पाप।
      होनहार हो कर हुतो, ऋंगी दीन्हों शाप॥

शमीक ऋषि तो मौन रहे, किन्तु उनके पुत्र ऋंगी ऋषि को जब इस बात का पता चला तो उन्हें राजा परीक्षित पर बहुत क्रोध आया। उस ऋषिकुमार ने कमण्डल से अपनी अंजुली में जल ले कर तथा उसे मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके राजा परीक्षित को यह श्राप दे दिया कि जा तुझे आज से सातवें दिन तक्षक सर्प डसेगा। जब परीक्षित को पता चला कि मुझे शाप दिया गया है तब तो उससे अपनी सुरक्षा बढा दी और एक खंभे का मकान बनवाकर  उस पर ही सैनिकों और वैद्य आदि के साथ रहने लगा और वही से राज्य का कार्य भार सम्भालते रहे, तब तक्षक ने अपने साथी नागों को ब्रह्मण का भेष बना फल ले कर राजा के यहाँ पहुँचाया और स्वयं उन फलों में एक छोटा सा कीट बन कर छिप गया ,जब वह राजा ने फल खाने के लिए उठाए तब तक्षक ने भयानक विशाल सर्प का रूप धारण कर लिया बन कर राजा को लपेड लिया और उसे डस लिया जिससे राजा की मृत्यु हो गई ।

📝 - इस पूरे प्रकरण में कही नहीं आया कि शुकदेव ने परीक्षित को भागवत कथा सुनाई, बल्कि राजा परीक्षित तो डर कर सात दिन  उंचे एक  खंभे पर अट्टालिका बना वही कठोर सुरक्षा में रहे वह गंगा तीर पर गये ही नहीं जैसा भागवत में लिखा है कि वो सात दिन तक गंगा के तीर में अनेक ऋषियों साथ सात दिन तक शुकदेव से भागवत सुनते रहे ।

 सबसे बड़ा सफेद झूठ तो यही है कि शुकदेव जी परीक्षित के समय थे। शुकदेव जी की मृत्यु तो महाराज युधिष्ठिर के शासनकाल से भी बहुत पहले हो गई थी यहाँ तक कि शुकदेव की मृत्यु के संबंध में शांतनु पुत्र भीष्म को भी नहीं पता था उन्होने भी किसी अन्य से उनके बारे में जानकारी प्राप्त की थी,  देखिए प्रमाण महाभारत (शांतिपर्व में मोक्षधर्म उपपर्व के अध्याय = 323-333 तक भीष्म युधिष्ठिर संवाद ,गीताप्रेश महाभारत पृष्ठ - 5327)

अब आप समझ गये होंगे कि जिस शुकदेव की मृत्यु के संबंध में भीष्म युधिष्ठिर के पूछने पर  उनको बता रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि शुकदेव युधिष्ठिर से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हुये अब बताओं कि जो शुकदेव युधिष्ठिर से पहले ही मर गये वो भला, अर्जुन के पोते परीक्षित को भागवत कथा कहां से सुनाने आयेंगे ,मतलब साफ है कि  यह भागवत भक्तिकालीन ग्रंथ है जो दक्षिण भारतीय चंडूखोर बैष्णवों ने बना कर तैयार किया था, जो समय समय पर लिखा जाता रहा और फिर बाद में शुकदेव और महर्षि व्यास के नाम से प्रसारित कर दिया गया।

..... #भागवत कथा #समाप्त ।

आइये अब आरती गाये भागवत कथा की

भागवत पाखंड की है आरती
धर्मियों को पाप में है डारती 

ये मूर्ख ग्रन्थ ये मुख्य पन्थ
ये पंचम अवेद निराला
नव ज्योति बुझानेवाला

काम गान यही वरदान यही
जग की अमंगल आरती
धर्मियों को पाप में है डारती   ...

ये अशान्तिगीत अपावन पुनीत सा
कोप बढानेवाला
हरि दरस न दिखानेवाला
है दुःख करनी, है सुःख हरिनी
कुब्जागामी की आरती
धर्मियों को पाप में है डारती   ...

ये धूर्त बोल, जग फन्द मोल
सन्मार्ग भटकानेवाला
बनी को मिटानेवाला
काम यही, प्रमाद यही
खल काम महिमा की आरती
धर्मियों को पाप में है डारती  ...

#बोलिये #कुब्जागामी #भगवान #रणछोड़ की #जय 

📝 -- यदि लेख में कुछ दोष रह गया हो तो कृपया हमें अगवत कराए , हम उस में  सुधार करने की कोशिश करेगें धन्यवाद 

#लेख #प्रगति #पर #है......................

सत्यार्थ प्रकाश।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के ‘#शंका-#समाधान #परिशिष्ट में पंडित  ज्वालाप्रसाद ‘शर्मा द्वारा नियोग प्रथा के समर्थन में अनेक प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। 

लिखा है कि प्राचीन वैदिक काल में कुलनाश के भय से ऋषि-मुनि, विद्वान, महापुरुषों से नियोग द्वारा वीर्य ग्रहण कर उच्च कुल की स्त्रियां संतान उत्पन्न करती थी। 

जो प्रमाण पंडित जी ने प्रस्तुत किए हैं वे सभी महाभारत काल के हैं। 

क्या #महाभारत काल ही प्राचीन वैदिक काल था ? क्या नियोग ही ऋषियों का एक मात्र प्रयोजन था?।

यहाँ यह तथ्य भी विचारणीय है कि अगर स्वामी दयानंद सरस्वती नियोग को एक वेद प्रतिपादित और स्थापित व्यवस्था मानते थे तो उन्होंने इस परंपरा का खुद पालन करके अपने अनुयायियों के लिए आदर्श प्रस्तुत क्यों नहीं किया ? इससे स्वामी जी के चरित्र को भी बल मिलता और एक मृत प्रायः हो चुकी वैदिक परंपरा पुनः जीवित हो जाती। 

यह भी एक अजीब विडंबना है कि जिस वैदिक मंत्र से स्वामी जी ने नियोग परंपरा को प्रतिपादित किया है उसी मंत्र से अन्य वेद विद्वानों और भाष्यकारों ने विधवा पुनर्विवाह का प्रतिपादन किया है। निम्न मंत्र देखिए -
👇 
‘‘कुह स्विद्दोषा कुह वस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोषतुः।
को वां शत्रुया विधवेव देवरं मंर्य न योषा कृणुते सधस्य आ।
                           (ऋग्वेद, 10-40-2)

‘‘उदीष्र्व नार्यभिजीवलोकं गतासुमेतमुप ‘शेष एहि।
हस्तग्राभस्य दिधिशोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ।।’’

                           (ऋग्वेद, 10-18-8)

उक्त दोनों मंत्रों से जहाँ स्वामी दयानंद सरस्वती ने नियोग प्रथा का भावार्थ निकाला है वहीं #ओमप्रकाश पाण्डेय ने इन्हीं मंत्रों का उल्लेख विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में किया है। 
अपनी पुस्तक ‘‘वैदिक साहित्य और संस्कृति का स्वरूप’’ में उन्होंने लिखा है कि वेदकालीन समाज में विधवा स्त्रियों को पुनर्विवाह की अनुमति प्राप्त थी।

 उक्त मंत्र (10-18-8) का भावार्थ उन्होंने निम्न प्रकार किया है -

‘‘हे नारी ! इस मृत पति को छोड़कर पुनः जीवितों के समूह में पदार्पण करो। तुमसे विवाह के लिए इच्छुक जो तुम्हारा दूसरा भावी पति है, उसे स्वीकार करो।’’

इसी मंत्र का भावार्थ #वैद्यनाथ ‘#शास्त्री द्वारा निम्न प्रकार किया गया है -

‘‘जब कोई स्त्री जो संतान आदि करने में समर्थ है, विधवा हो जाती है तब वह नियुक्त पति के साथ संतान उत्पत्ति के लिए नियोग कर सकती है।’’

उक्त मंत्रों में स्वामी दयानंद ने देवर ‘शब्द का अर्थ जहाँ ‘द्वितीय नियुक्त पति’ लिया है वहीं पाण्डेय जी ने देवर ‘शब्द का अर्थ ‘द्वितीय विवाहित पति’ लिया है।

 निरुक्त के संदर्भ में पाण्डेय जी ने लिखा है कि यास्क ने अपने निरूक्त में देवर ‘शब्द का निर्वचन ‘द्वितीय वर’ के रूप में ही किया है।

 उक्त मंत्रों के साथ पाण्डेय जी ने अथर्ववेद का भी एक मंत्र विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में प्रस्तुत किया है। जो निम्न है -

‘‘या पूर्वं पतिं वित्त्वाथान्यं विन्दते परम्।
पत्र्चैदनं च तावजं ददातो न वि योषतः।।
समानलोको भवति पुनर्भुवापरः पतिः।
योऽजं पत्र्चैदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति।।’’
                        
                                    (अथर्वसंहिता 9-5-27,28)

उक्त से स्पष्ट है कि वेद भाष्यों में इतना अधिक अर्थ भेद और मतभेद पाया जाता है कि सत्य और विश्वसनीय धारणाओं का निर्णय करना अत्यंत मुश्किल काम है?

 यहाँ यह भी विचारणीय है कि विवाह का उद्देश्य केवल संतानोत्पत्ति करना ही नहीं होता बल्कि स्वच्छंद यौन संबंध को रोकना और भावों को संयमित करना भी है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि जो विषय (नारी और सेक्स) एक बाल ब्रह्मचारी के लिए कतई निषिद्ध था, स्वामी जी ने उसे भी अपनी चर्चा और लेखनी का विषय बनाया है।

राम।


दीवाली राम के अयोध्या लौटने से सम्बंधित उत्सव नही है इसका सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण यह है कि वाल्मीकि रामायण,पद्मपुराण और रामचरित मानस के अनुसार राम अयोध्या में वैसाख के महीने में लौटे थे।पद्मपुराण के अनुसार राम वैसाख महीने में शुक्ल पक्ष के पंचमी को अर्थात पाँचवे दिन को वनवास से लौटे थे।बैसाख का महिना लगभग अंग्रेजी केलेंडर के अप्रैल महीने में आता है।तो फिर दीपावली राम के अयोध्या आगमन पर मनाई जाती है यह अफवा क्यों फैलाई गई और आज भी क्यों फैलाई जा रही है।

Wednesday, 10 August 2022

विवेकानंद

 


पत्रावली म्हणून स्वामी विवेकानंद यांच्या पत्रांचा संग्रह असलेलं एक पुस्तक आहे
यात स्वामी विवेकानंद एका मित्राला पत्रांमध्ये सांगतात
आपण गरिबांवर अत्याचार बंद करायला पाहिजे, किती हास्यास्पद दशेला आपण पोहचलो आहोत, कोणी भंगी आपल्या जवळ आला तर आपण त्याला अस्पृश्य म्हणून त्याच्या पासुन लांब पळतो, परंतु त्याच्या डोक्यावर एक कटोरी पाणी टाकून पादरी त्याला प्रार्थना म्हणायला सांगून घालण्यासाठी एक कोट देतो, तेव्हा तो कोणत्याही हिंदूच्या घरी गेला तरी त्याला कोणी अडवत नाही.
दक्षिण भारतात पादरी लोक लाखोच्या संख्येने खालच्या जातीच्या लोकांना इसाई बनवत आहे.
भारतात त्रावणकोर मध्ये पुरोहितांचे अत्याचार सर्वात जास्त आहे तिथं जमिनीच्या प्रत्येक तुकड्याचे मालक ब्राह्मण आहे आणि तिथं राजघराण्यातील स्त्रिया पण ब्राह्मणांची उपपत्नी(रखेल) बनून राहण्यात गौरव मानतात.
येथे जवळ जवळ 25% लोक ईसाई झाले आहे, मी त्या बीचार्यांना का दोष देऊ.
मनुष्य कधी दुसऱ्या मनुष्यांशी बंधुत्वांने वागायला शिकेल ?
स्वामी विवेकानंद : पत्रावली पृष्ट 40
Patravali is a book with a collection of letters from Swami Vivekananda
In this, Swami Vivekananda tells a friend in letters
We need to stop oppressing the poor, what a ridiculous situation we have reached, if any pose comes near us we run away from him as untouchable, but throw a bowl of water on his head and tell him to say prayer When he gives a coat for this, he goes to whichever Hindu's house, he will give him No one is stopping.
In South India, pastors are making millions of lower caste people Christians.
In India, there is the highest atrocities of priests in Travankor, where every piece of land is Brahmin and there women in royal family also feel proud to be the deputy wife of Brahmins.
Almost 25% of the people here have become Christians, why should I blame those poor people.
When will a man learn to behave brotherly with other humans?
Swami Vivekananda: Patravali Page 40


 

गीता

 काही धार्मिक सेमी पुरोगामी लोक म्हणताना दिसतात की गीता धार्मिक ग्रंथ नसून तत्वज्ञानाचा ग्रंथ आहे जो प्रत्येकासाठी उपयोगी आहे,

परंतु हे न वाचल्याचं अज्ञान आहे,
गीतेमध्ये जागोजागी बामन धर्मातील संकल्पना आलेल्या आहे,
ज्या खालील प्रमाणे आहे.
अधर्म प्रबळ झाल्यावर स्त्रिया दूषित होतात, स्त्रिया दूषित झाल्यावर वर्ण संकर (आंतरजातीय) संतान उत्पन्न होतात
वर्ण संकरतेमुळे कुळ धर्म नष्ट होतो,
ज्यांचा कुळ धर्म नष्ट होतो ते नरकात जातात
(गीता 1/41,42,43,44)
(इथ बामन धर्मातील वर्णसंकरता संकल्पना आलेली आहे)
जस मनुष्य जुने वस्त्र सोडून नवीन वस्त्र ग्रहण करतो तसचं आत्मा जीर्ण शरीर सोडून नवीन शरीर ग्रहण करते
(गीता 2/22)
(बामन धर्मानुसार आत्मा एक शरीर सोडून दुसऱ्या शरीरात प्रवेश करत असते)
जे फक्त स्वतः साठी अन्न बनवतात, त्याला वाटत नाही, यज्ञ करत नाही ते पापी आहेत
(गीता 3/13)
(यज्ञ करा बामनांना फुकट जेवण द्या या सगळ्या बामन धर्मातील मान्यता होत्या/आहे)
पुढे 3/15 मध्ये ब्रह्म संकल्पना आहे जे की बामन धर्मातील आहे.
जेव्हा जेव्हा धर्माची हानी होऊन अधर्म वाढतो तेव्हा मी स्वतः धर्माचा उद्धार करण्यासाठी अवतार धारण करतो (गीता 4/7)
(अवतारवाद बामन धर्मातील आहे)
यज्ञाद्वारे सिद्धी मिळवणारे लोक देवतांना प्रसन्न करण्यासाठी यज्ञ करतात, यज्ञाद्वारे लवकरच सिद्धी प्राप्त होते (गीता 4/12)
(देवी देवतांना प्रसन्न करण्यासाठी यज्ञ करणे बामन धर्मात आहे)
गुण-कर्म च्या आधारे चातुर्वर्ण्य सृष्टी मी तयार केली आहे, याचा कर्ता मी आहे (गीता 4/13)
(वर्ण व्यवस्था बामन धर्मातील आहे)
पुढं 4/23,24 मध्ये पुन्हा यज्ञ कर्मकांड चा उल्लेख आहे, जे बामन धर्मातील प्रथा आहे.
4/32 मध्ये परत यज्ञाचा उल्लेख आहे.
9/27,28 मध्ये यज्ञ हवन कर्मकांड चा उल्लेख आहे
पुण्यवान लोक, स्वर्गात चिरकाल पर्यंत राहून पवित्र धनवान घरात जन्म घेतात (गीता 6/41)
(पाप पुण्य नुसार चांगला वाईट जन्म मिळणे ही बामन धर्मातील प्रसिद्ध संकल्पना आहे)
7/21,22 मध्ये देवी देवतांची भक्ती पूजा उपासनेचा उल्लेख आहे.
पुढं गितेत आहे,
वेदांमध्ये मी सामवेद आहे(गीता 10/22)
मी ऋग्वेद सामवेद आणि यजुर्वेद आहे (गीता 9/17)
जे लोक मनुष्य शरीर बघून मला मनुष्य समजतात आणि ईश्वर समजत नाही ते मुढ (मूर्ख) आहे (गीता 9/11)
(माणसाला धमकी देणारे, भीती दाखवणारे देव फक्त बामन धर्मात आहे)
माझा आश्रय घेतल्याने, स्त्रिया, वैश्य, शूद्र हे पापयोनी लोक पण परम गतीला प्राप्त होतात(गीता 9/32)
(ही पण बामन धर्मातीलच शिकवण आहे)
पुढे 17/11 मध्ये पुन्हा यज्ञांचा उल्लेख आहे
देवांची पूजा, ब्राह्मणांची पूजा, गुरूची पूजा हे सर्व शारीरिक तप आहे(गीता 17/14)
(बामन उदात्तीकरण केल्याशिवाय कोणताही बामन ग्रंथ पूर्ण होत नाही, गीता पण त्यापैकीच एक)
सृष्टीच्या आदी काळात ब्राह्मण वेद आणि यज्ञ या तिघांची रचना झाली
(गीता 17/23)
(ही पण बामन धर्मातीलच मान्यता आहे)
बामन क्षत्रिय वैश्य यांची कामे सांगितल्या नंतर गीतेत शुद्रांच्या कामांचा उल्लेख आहे
वरील तीन वर्णांची सेवा करणे हेच शुद्राचे कर्म आहे(गीता 18/44)
(जे की ओबीसी शूद्र आज पण करतांना दिसतात, प्रत्येक बाबतीत)
पुढं शेवटी आहे की जो हा संवाद(गीता) ऐकेल तो पापातून मुक्त होऊन, पुण्य कर्माला प्राप्त होतो(,गीता 18/71)
(बामन धर्मातील सगळ्याच ग्रंथात पापातून मुक्त होण्याचे सरळ सोपे उपाय सांगितले आहे, कारण तो धर्मच पापी लोकांनी भरलेला आहे)
तर अशा प्रकारे गीतेमध्ये जागोजागी बामन धर्मातील संकल्पना आहे, त्यामुळे हा सर्वांसाठी असणारा तत्वज्ञानाचा ग्रंथ नसून एक बामन ग्रंथ आहे, जो संस्कृत नीट न शिकलेल्या बामनाने गुप्त काळात त्याच्या झोपडीत बसून लिहिला होता.
Some religious semi progressive people seem to say that Geeta is not a religious book but a book of philosophy which is useful for everyone,
But this is the ignorance of not reading,
The concept of Brahmin religion has come everywhere in the Geeta,
Which is as follows.
When injustice prevails women are corrupted, when women are contaminated, there are characteristics (intercaste) children
Ancestral religion is destroyed due to caste sympathy,
Those whose religion and religion are destroyed go to hell
(Gita 1/41,42,43,44)
(The concept of racism in Brahmin religion has come here)
Just as a man leaves old clothes and accepts new clothes, the soul leaves the dead body and accepts the new body
(Gita 2/22)
(According to Brahmin religion, the soul leaves one body and enters another body)
Those who cook food only for themselves, do not think, do not perform yajna, are sinners
(Gita 3/13)
(Yagna, give free food to Brahmins. All these were accepted in Brahmin religion)
Next 3/15 has the concept of Brahma which is from Brahma religion.
Whenever injustice increases due to loss of religion, I myself incarnate to save religion (Gita 4/7)
(Avatarism is from Brahmin religion)
People who achieve achieve success through Yajna perform yajna to please the gods, through Yajna soon achieve success (Geeta 4/12)
(It is in Brahmin religion to do sacrifice to please the gods and gods)
I have created the Chaturvarnya creation based on virtues and deeds, I am the creator of it (Gita 4/13)
(Caste system is from Brahmin religion)
Next 4/23,24 there is a mention of Yagna rituals, which is a custom in Brahmin religion.
4/32. Yadna is mentioned again.
9/27,28 Yajna Havan rituals are mentioned
Blessed people, live in heaven forever and take birth in holy riches house (Gita 6/41)
(Getting good and bad birth according to sin and virtue is a famous concept in Brahmin religion)
In 7/21,22, there is a mention of devotion and worship of goddesses.
Next is in the song,
I am Samved in the Vedas (Gita 10/22)
I am Rigveda Samveda and Yajurveda (Gita 9/17)
People who consider me a human by seeing a human body and do not understand God are stupid (Gita 9/11)
(The God who threatens and frightens people is only in Brahmin religion)
By taking refuge in me, women, Vaishya, Shudra are also acquired by sinners (Gita 9/32)
(This is also a teaching from Brahmin religion)
Yadna is mentioned again in next 17/11
Worship of Gods, worship of Brahmins, worship of Guru are all physical penance (Gita 17/14)
(No Brahmin book is complete without Brahmin Uttarikaran, Geeta is also one of them)
Three Brahmin Vedas and Yajna were formed in the beginning of the creation
(Gita 17/23)
(This is also accepted in Brahmin religion)
After explaining the works of Brahmin Kshatriya Vaishya, the song mentioned the works of Shudra
To serve the above three characters is the work of Shudra (Gita 18/44)
(Which OBC Shudra is seen doing today also, in every case)
It is at the end that whoever listens to this dialogue (Gita) gets free from sin and gets good deeds (,Gita 18/71)
(All the scriptures of Brahmin religion have given simple ways to get rid of sin, because that religion itself is filled with sinful people)
So this is how the Geeta has the concept of Brahmin religion everywhere, so it is not a philosophy book for everyone but a Brahmin book, which was written by a Sanskrit well uneducated Brahmin in his hut in a secret time.

मांस

 

नवरात्री निमित्त दिल्ली मध्ये सर्व प्रकारच्या मांसाहारावर बंदी असल्याची बातमी ऐकली
परंतु दुर्गा सप्तशती ग्रंथ वाचल्यावर देवी स्वतः मांसाहारीच नाही तर नरभक्षी असल्याचं आढळलं
देवी राक्षसांबरोबर युद्ध करतांना त्या सर्व राक्षसांना जिवंत खात असे,
रक्तबीज नावाच्या राक्षसाला मारल्या नंतर देवीने त्याचे सर्व रक्त पेऊन घेतले होते
(दुर्गा सप्तशती 8/54-59)
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ज्या धर्मातील देवी एव्हडी हिसक आहे त्या धर्मातील त्रैवर्णिक अहिंसा शिकवून सामान्य मांसाहाराला विरोध करणे किती विचित्र आहे
Heard news that all types of meat is banned in Delhi on the occasion of Navratri
But after reading the Durga Saptashati book, the Devi herself was not only a non-vegetarian but a cannibal.
The goddess used to eat all those demons alive while fighting with demons,
After killing a demon named Raktabeej, the goddess had drank all her blood
(Durga Saptashati 8/54-59)



 

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यूपी मध्ये 7 शहरात सर्व प्रकारच्या मांस विक्रीवर बंदी आहे, अधिकतर SC St obc मांसाहारी असताना,
योग्य अयोग्य, चांगल वाईट हे सगळ त्रैवर्णिकांच्या आवडीनुसार ठरवलं जातं, हिंदू शब्द फक्त मुस्लिमांसमोर मोठी संख्या दाखवण्यासाठी वापरला जातो.
शिवाय ग्रंथांमध्ये पण जागोजागी मांसाहाराचा उल्लेख आहे,
यूपी भोळ्या मंदबुद्धी कट्टर हिंदूसाठी रामराज्य असल्यामुळे रामायणातीलच काही उदाहरणे दाखवतो,
बालकाण्ड 14 मध्ये दशरथ ने बामन पुरोहितांकडुन अश्वमेध यज्ञ करवून मुख्य घोडा आणि इतर 300 पशुंचा
बळी दिला होता
(वाल्मिकी रामायण, बालकाण्ड 14/1-37)
रामायणात बामन लोक श्राद्ध मध्ये मेंढीच मटण खात असल्याचा पण उल्लेख आहे
(अरण्यकांड 11/58-60)
भरत आणि गुहराजची भेट झाल्यावर त्याच्या स्वागतासाठी मासे, मटण हे भोजणसाठी दिले
(अयोध्या काण्ड 84/10)
वनवासाच्या पहिल्या दिवशीच राम लक्ष्मणने 4 हरणांची शिकार करून त्यांच मांस खाल्ले, नंतर झाडाखाली झोपी गेले
(अयोध्या काण्ड 52/102)
वनवासात झोपडी बांधल्यानंतर दीर्घायुष्य मिळावे यासाठी राम लक्ष्मण झोपडीत प्रवेश करण्यापूर्वी हरणाचा बळी देतात
( अयोध्या काण्ड 56/31,34)
अरण्य कांड 73/15-16 मध्ये लक्ष्मण ने खाण्यासाठी मासेमारी केल्याचा उल्लेख आहे.
रावण वेश बदलून भिक्षा मागण्यासाठी आल्यावर सिता म्हणते,
माझे पती वन्य पदार्थ, गोह, जंगली सूअर यांचे मांस घेऊन येतच असतील
(अरण्यकांड 47/23)
नोट : 1.आर्य समाज ने त्यांच्या रामायणातुन हे सगळ काढून टाकल आहे
2. गीता प्रेस ने पण नवीन आवृत्ती मध्ये अर्थ बदलले आहे.
7 cities in UP banned all types of meat, mostly SC St obc non-vegetarian,
Right or wrong, good or bad are all decided as per the choice of the trivarnik, Hindu word is used only to show large numbers in front of Muslims.
Apart from the books, meat is mentioned everywhere,
Since UP is a Ramrajya for innocent retarded hardcore Hindus, it shows some examples from Ramayana,
In Balkand 14, Dashrath performed Ashwamedh Yagya from Brahmin priests and the main horse and 300 other animals
Had given the sacrifice
(Valmiki Ramayana, Child Scandal 14/1-37)
It is also mentioned in Ramayana that Brahmin people are eating sheep mutton in Shraddha
(Aranyakand 11/58-60)
After meeting Bharat and Guharaj, they gave fish, mutton for food to welcome him.
(Ayodhya scandal 84/10)
On the first day of exile, Ram Lakshman hunted 4 deer and ate their meat, then slept under a tree
(Ayodhya scandal 52/102)
Ram Lakshman sacrificed deer before entering the hut after building a hut in exile
(Ayodhya scandal 56/31,34)
Aranya scandal 73/15-16 mentioned that Laxman did fishing to eat.
When Ravana comes to beg in disguise, Sita says,
My husband must be bringing wild food, goh, wild pork meat
(Aranyakand 47/23)
Note : 1. Arya community has removed all this from their Ramayana
2. Geeta Press has also changed the meaning in the new version.

काफिर और शूद्र।

काफिर vs शूद्र
कुराण मधील काफिर हा 60,65 च्या आसपास IQ असणाऱ्या भोळ्या मंदबुद्धी कट्टर हिंदूचा अत्यंत जिव्हाळ्याचा विषय आहे, त्यांच्यानुसर कुराण मध्ये काफिरांना मारण्याची शिकवण असल्यामुळे त्यांच्या पासून आपल्या सर्वांना धोका आहे
परंतु त्याहून अधिक हिंसक वाईट लिखाण बामन ग्रंथात शूद्रांबद्दल आहे.
शुद्राने वेदपाठ ऐकल्यावर त्याच्या कानात वितळलेले शिसे टाकावे, वेदातील अक्षरांचा उच्चार केल्यावर जिभ कापावी, वेदमंत्र धारण केल्यावर(लक्षात ठेवल्यावर) हत्या करावी
(गौतम धर्मसुत्र 3-2-4, संस्कृत ग्रंथमाला,चौखंबा,हिंदी अनु.ऊपेशचंद्र पांडे, पृष्ठ 118)
बामन धर्मात जगत गुरु मानल्या जाणाऱ्या आदी शंकराचार्य ने देखील हेच लिहिलं आहे
शुद्राने वेदपाठ ऐकल्यावर त्याच्या कानात वितळलेले शिसे टाकावे, वेदातील अक्षरांचा उच्चार केल्यावर जिभ कापावी, वेदमंत्र धारण केल्यावर(लक्षात ठेवल्यावर) हत्या करावी
( ब्रह्म सुत्र 1-3-38 शंकराचार्य भाष्य)
जप होम इत्यादी ब्राह्मनांचे उचित कर्म करणाऱ्या शूद्राचा राजाने वध करावा, जप होम करणारा शूद्र संपूर्ण राज्याचा नाश करतो.
( अत्रि स्मृती 1/19)
(वाल्मिकी रामायणात रामाने शूद्र शम्बुक यांचा खून सुद्धा याच कारणामुळे झाला होता)
शुद्राला जमिनीवर पडलेले अन्न द्यावे, जसा कुत्रा आहे तसाच शूद्र
(आपस्तंभ स्मृती 9/34)
शूद्राचे नाव निंदित शब्दाने युक्त आणि दास (गुलाम) शब्दाने युक्त असावे
(मनुस्मृती 2/31,32)
राजाने शूद्राकडुन द्विज सेवेचे कर्म करवून घ्यावे, आपल्या कर्मतून भ्रष्ट झाल्यावर ते या संसाराला भ्रमित करतात
(मनुस्मृती 8/418)
शुद्राने धन संग्रह करू नये, धन प्राप्त करून ब्राह्मण सेवेचा त्याग करून तो ब्राह्मणांना पीडित करतो
(मनुस्मृती 10/129)
द्विजांना कठोर वचन बोलणाऱ्या शूद्राची जीभ कापावी,
राजाने ब्राह्मणाला धर्मोपदेश करणाऱ्या शूद्राच्या कानात मुखात उकळते तेल टाकावे
( मनुस्मृती 8/270,271,272)
(ही काही ठराविक उदाहरण आहे, अशा प्रकारचे श्लोक सगळ्या ग्रंथात जागोजागी आहे)
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पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ, अंकुर आर्य, निरज अत्रि अनेक संघी यूट्यूब वर हिंदू मुस्लिम कुराण काफिर जिहाद यावर बोलतांना दिसतात,
परंतु त्यांच्या ग्रंथात शूद्रांविषयी काय लिहिले आहे याकडे ते जाणीवपूर्वक दुर्लक्ष करतात
भोळ्या मंदबुद्धी कट्टर हिंदूना माहिती पाहिजे की ते ज्या ज्या वाईट गोष्टी दुसऱ्यांमध्ये शोधतात ते सर्वात जास्त त्यांच्याच धर्मात आहे.
नोट : इथ इस्लाम किंवा कुराणची बाजू घेतलेली नसून फक्त संघ भाजपाच्या राजकारणाला उत्तर दिलं आहे.
Kafir vs Shudra
Kafir in Quran is a very close subject of innocent retarded fanatic Hindus with IQ around 60,65, according to them Quran teaching to kill infidels we all are in danger from them
But even more violent bad writing is about Shudras in Baman book.
Shudra should put melted glasses in his ear after listening to Vedas, cut his tongue when pronouncing Vedas letters, murder after wearing Vedamantra (remembering)
(Gautam Dharmasutra 3-2-4, Sanskrit Library, Chowkhamba, Hindi Anu. Upeshchandra Pandey, page 118)
Adi Shankaracharya, who is considered as Jagat Guru in Brahmin religion, also wrote the same thing
Shudra should put melted glasses in his ear after listening to Vedas, cut his tongue when pronouncing Vedas letters, murder after wearing Vedamantra (remembering)
(Brahma Sutra 1-38 Shankaracharya Speech)
King should kill Shudra who does proper deeds of Brahmins like chanting home etc., Shudra who performs chanting Hom destroys the entire state.
( Atri Memory 1/19 )
(Rama killed Shudra Shambuk in Valmiki Ramayana for this reason)
Shudra should be given food lying on the ground, Shudra is like a dog
(You pole memory 9/34)
Shudra's name should be filled with condemned words and slave (slave) word
(Manusmriti 2/31,32)
The king should get the work of two service from Shudra, after being corrupted by his deeds, they confuse the world
(Manusmriti 8/418)
Shudra shouldn't collect money, he suffers Brahmins by getting money and sacrificing service to Brahmin
(Manusmriti 10/129)
Shudra, who speaks harsh words to two, should be cut off his tongue,
The king should put boiling oil in the ears of Shudra preaching Brahmin
( Manusmriti 8/270,271,272)
(This is a certain example, such verses are everywhere in the book)
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Pushpendra Kulshrestha, Ankur Arya, Niraj Atri many Sanghis are seen speaking on YouTube about Hindu Muslim Quran Kafir Jihad.
But they deliberately ignore what is written about Shudras in their books
Innocent retarded hardcore Hindus should know that the bad things they find in others are most in their own religion.
Note: There is no side of Islam or Quran

पृथिवी राज।


पृथ्वीराजचा क्षत्रिय घोरी सरांबरोबर झालेल्या पराभवाचा
संक्षिप्त इतिहास
हिन्दू इतिहास हारों की दास्तान, सुरेंद्र कुमार शर्मा 'अज्ञात' पृष्ठ 15 वरून
Prithviraj's defeat with Kshatriya Ghori sir
A brief history
Hindu history tale of defeats, Surendra Kumar Sharma from 'Unknown' page 15

चाणक्य।


चाणक्य आणि त्याची बुद्धिमत्ता
काल्पनिक पात्र चाणक्यला बामन लोकांनी सतत उदात्तीकरण करून मोठ्या प्रमाणावर प्रसिद्ध केलं आहे.
वेळोवेळी त्याच्या नावाचा उल्लेख होताना आपल्याला दिसतो.
एक कालबाह्य बामन पात्राला बुद्धिमान विद्वान म्हणून प्रचारित केलं असल्यामुळे मी काल्पनिक चाणक्यची बुद्धिमत्ता जाणून घेण्यासाठी त्याच्या नावाने असलेला अर्थशास्त्र ग्रंथ वाचायचं ठरवलं
त्यावर समीक्षा म्हणून एक वेगळं पुस्तक तयार होऊ शकत, या पोस्ट मध्ये फक्त शत्रूचा विनाश करण्यासाठी चाणक्य(कौटिल्य) ने सांगितलेले काही उपायांचा उल्लेख करत आहे.
केशर कस्तूरी, कुमकुम,चा लेप, विंचू, मासे, धान्य यांचा धूर करून, तेज हवेत ठेवावा, धूर जेवढ्या अंतरापर्यंत जाईल तिथल्या सर्व प्राण्यांचा मृत्यू होईल.
( अर्थशास्त्र 14/177/1)
सांपाची त्वचा, गाईचा गोबर, घोड्याची लिद (विष्टा), दोन तोंडी सांपाच डोकं, यांचा धूर शत्रूला आंधळा करतो.
(अर्थशास्त्र 14/177/1)
तीन दिवस उपवास करून अमावस्या ला एक उंदराचा तुकडा घेऊन एका डब्ब्यात बंद करून स्मशानात खड्डा खोदून ठेवावा, पुढच्या चतुर्थीला त्याचे चूर्ण करून, एक एक गोळी, 'बलिं वैरोचनं' हा मंत्र म्हणून ज्या स्थानावर फेकली जाईल, त्या ठिकाणी सर्व प्राणी बेशुध्द होतील
(14/178/3)
पुनर्नवा ( वनस्पती), लिंबू, धमासा( वनस्पती), मनुष्याची हड्डी या सर्वांना ज्या घर, सेना, गाव नगर मध्ये गाढले जाते तिथे संपूर्ण विनाश होतो.
(14/178/3)
पोस्ट जास्त मोठी होऊ नये म्हणून ही काही उदाहरणे दिली आहे.
हा पूर्ण अध्याय अशाच विज्ञान विरोधी, विचित्र, विनोदी उपायांनी भरलेला आहे,
ज्यात गाय, गोबर, विष्टा, मुत्र, वीर्य, मृत प्राणी, हड्डी, मानव कवटी, मंत्र तंत्र वापरून शत्रूचा नायनाट केला जातो.
Chanakya and his intelligence
Fictional character Chanakya has been made famous by Brahmin people by continuously excelling him.
We see his name being mentioned from time to time.
Since an expired Brahmin character was promoted as an intelligent scholar, I decided to read an economics book named after him to learn the intelligence of imaginary Chanakya
A separate book can be created as a review on it, this post only chenakya (Kautilya) mentions some measures to destroy the enemy.
Smoke saffron musk, kumkum, coating, scorpions, fish, grains, keep brightness in air, as far as smoke goes, all animals will die.
( Economics 14/177/1)
Snake skin, cow dung, horse lid (vishta), two mouthed snake head, their smoke blinds the enemy.
(Economics 14/177/1)
After fasting for three days, a piece of mouse should be locked in a box and dig a pit in the cemetery, on the next fourth, one bullet, at the place where 'Bali Vairochana' is thrown as a mantra, all the animals will be unconscious
(14/178/3)
Repeat (plant), lemon, dhamasa (plant), human bone, all of them are buried in the house, Sena, village nagar, there is complete destruction.
(14/178/3)
Here are some examples so that the post does not get too big.
This whole chapter is filled with such anti-science, weird, humorous measures,
In which cows, dung, vishta, urine, semen, dead animals, bones, human skull, mantra techniques are destroyed.

कथाएं।

Shiva Purana, Rudra Samhita 2, Yudha Khanda 5, Ch 23.38-45 😅

विवाह प्रकार।

मनुस्मृति में ८ प्रकार का शादी का उल्लेख है इनमें एक हैं राक्षस और असुर विवाह 
जिसमें अगर किसी हिन्नू वीर को किसी के बहन बेटी पसंद आ जाए और लड़की और लड़की के घर वाले राज़ी न हो तो हिन्नू वीर उस लड़की से बलात्कार कर के फिर शादी कर सकते हैं ।
९/१९६,१९७
 (ब्रह्म-दैव-आर्ष-गान्धर्व-प्राजापत्येषु यत् वसु) ब्राह्म, देव, आर्ष, गान्धर्व, प्राजापत्य विवाहों में जो स्त्री को धन प्राप्त हुआ है (अप्रजायाम्+अतीतायाम्) स्त्री के सन्तानहीन मर जाने पर (तत् भर्तुः + एवइष्यते) उस धन पर पति का ही अधिकार माना गया है । 
 ।
 (यत् तु अस्याः) और जो इसे (आसुरादिषु
 विवाहेषु दत्तं धनं स्यात्) 'आसुर' गन्धर्व, राक्षस,
 पैशाच [३.२१] विवाहों में दिया गया धन हो
 (अप्रजायाम्+अतीतायाम्) पत्नी के नि:सन्तान मर
 जाने पर (तत् माता पित्रोः इष्यते) वह धन स्त्री के
 माता-पिता का हो जाता है ॥ विशुद्ध मनुस्मृति ९/१९७॥

 ब्राह्म, देव, आर्ष, गान्धर्व, प्राजापत्य, असुर , राक्षस विवाहों में जो स्त्री को धन प्राप्त हुआ है वो धन ।
 अब देखते हैं असुर और राक्षस विवाह किसे बोलते हैं ?
 ।
 *(लड़ाई करके बलात्कार अर्थात् छीन, झपट वा कपट से कन्या का ग्रहण करना ‘राक्षस’ विवाह कहलाता है। शयन वा मद्यादि पी हुई पागल कन्या से बलात्कार संयोग करना ‘पैशाच विवाह कहलाता है)*
 ।
 
 कन्या अथवा कन्या की जाति वालों को धन देकर कन्या लेना आसुर विवाह कहलाता है। अर्थात लड़की खरीद लें कर विवाह करना 
 
 *हनन, छेदन अर्थात् कन्या के रोकने वालों का विदारण कर क्रोशती, रोती, कंपती और भयभीत हुई कन्या को बलात्कार हरण कर के विवाह करना वह ‘राक्षस विवाह’ ।
 *(सं० वि० विवाह सं०)

हिंसा।


अगर ऐसी बात पवित्र कुरान में लिखे होते 
मानवता वादी नंगा नाच करते फिरते तब 
कौन कैसा ईश्वर हैं यह जो इंसानों को जंगली जानवरों से खिलाने के बात करता है । 
अथर्ववेद - काण्ड » 11; सूक्त » 10; मन्त्र » 23 
 
 अथर्ववेद भाष्य (पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी) - हिन्दी - Pandit Kshemkarandas Trivedi
 
 पदार्थ -
 (ये) जो (अमित्राः) शत्रु लोग (वर्मिणः) वर्म [कवच विशेष] वाले हैं, (ये) जो (अवर्माणः) विना कर्मवाले हैं, (च) और (ये) जो (वर्मिणः) झिलमवाले हैं। (अर्बुदे) हे अर्बुदि [शूर सेनापति] (तान् सर्वान्) उन सब (हतान्)  मारे गयों को (श्वानः) कुत्ते (भूम्याम्) रणभूमि पर (अदन्तु) खावें ॥२३॥
भावार्थ - शूर सेनापति से मारे गये सब शत्रुओं की लोथों को कुत्ते आदि खावें ॥२३॥

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Tuesday, 9 August 2022

परशुराम।

पर+शु+राम- पराया + शुद्र+ राम ,से परशुराम बना...

          कैसे ???

भारत के इतिहास के शुरूआती दौर में आर्यो के आगमन के बाद भारत में आर्यो ने चार वर्ण का निर्माण किया, ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, और शूद्र दो प्रकार के थे सछुत और अछूत ...सछुत जो इन तीनों वर्णो की सेवा करता था और अछूत जो इन सबसे बहुत दूर रहता था और उसे दिन में निकलना मना था...
और समाज का प्रमुख ब्राह्मण होता था.. एक बार क्षत्रियों ने ब्राह्मण के सामने एक सर्त रखी की राज्य की सीमा की रक्षा हम करते हैं हम अपने प्राण देते है राज्य के लिए लेकिन हमें कुछ नही मिलता राज्य में सारे अधिकार आपके पास हैं...ऐसा करिये आप पुरोहित बन जाइये और हमे शासक(राजा) घोसित कर दीजिये..ब्राह्मणों ने नकार दिया और क्षत्रियो को ये बात पची नहीं और वो ब्राह्मणों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया और युद्ध में सारे ब्राह्मण पुरुष मारे गए क्योकि ब्राह्मन युद्ध में हथियार चलाना नही जानते थे.... सिर्फ महिलाएं बची और वो भागकर अछूत शुद्र के यहाँ पनाह ली क्योकि महिलाये जानती थी की अछूत शुद्र के यहाँ क्षत्रिय नहीं आएंगे.. फिर अछूत शुद्र और ब्राह्मण महिला के मिलन से एक पुत्र पैदा हुआ जो परशुराम कहलाया और यहीं से ब्राह्मणों में चमरू संतान गोत्र आ गया...आज भारत में जितने भी ब्राह्मण है वो शूद्रों के ही वंशज है लेकिन इस कहानी को छुपा लिया गया ताकि शुद्र इस बात को जानने ना पाएं...

पर+शु+राम- पराया + शुद्र+ राम ,से परशुराम बना...

जब परशुराम की माँ ने बताया तो उसने अपने आप को ब्राह्मण पुत्र सिद्ध करने के लिए अपने पिता की हत्या कर दी।

इसके बाद परशुराम ने क्षत्रियों से युद्ध शुरू किया और जिसमें क्षत्रियों को 21 बार पराजित कर सभी क्षत्रियों को मार दिया... और क्षत्रियों की महिलाएं भी जाकर अछूत शुद्र के यहाँ पनाह ली...

इसके बाद जो पुत्र हुए वे आपस में सुलह कर लिए और क्षत्रिय ब्राह्मण को अपने से श्रेष्ट बना लिए एक दूसरे के सहयोगी बनकर साथ काम करने लगे..

लेकिन जिन्होंने इनकी माताओ पनाह दिया और जिनसे ये उत्पन्न हुए उन्ही की इनकी माताओ ने हत्या करवा दी और भी ज्यादा शुद्रो के साथ अत्याचार शुरू कर दिए....

भारत के सभी ब्राह्मण ठाकुर भी शुद्र हैं

पर इस बात को ये मानेंगे नही क्योकि ऐसे इतिहास को छुपा लिया जाता है ताकि अपनी प्रतिष्ठा बनी रहे ।

यकीन नहीं तो कभी होशियार ब्राह्मण से पूछियेगा की आपके जाती में चमरू संतान होती है या नहीं..

पशु संभोग।


जानवरों के साथ सेक्स 

यजुर्वेद भाष्य 21/60 में लिखते है 

हे मनुष्यों ! प्राण और अपान के लिए दुःख विनाश करने वाले छेरी आदि पशु से , वाणी के लिए मेंढा ( मेंढक ) से , और परम ऐश्वर्य के लिए बैल से भोग करें "

तो यहां स्वामी  अपने अनुयाययों के लिए कह रहे है कि 

अगर वो दुःखी है तो छेरी(बकरी) से भोग करे और ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए बैल से भोग करे

टाइगर, Sher,

  संवृतस्मृति अनुसार ज़ब सना टुन्नी लड़कीयों के योनि मे फस्ट टाइम बाल आता है तो मून देवता सेक्स करके चले जाते है ज़ब फस्ट टाइम मेंस आता है तो ...